मृगमरीचिका-सा भ्रम जाल फैलाती
कभी धूप-सी जलाती है ज़िंदगी।
बरसात बन भिगोती है कभी
पेड़-सा आसरा बनती है ज़िंदगी।
सँकरी गलियों के मोड़-सी लगती
राह दिखाती है हाथ बढ़ाती हुई।
घनघोर निराशा में पीठ थपथपाती
तुम्हारी परछाई-सी है ज़िंदगी।
राह दिखाती है हाथ बढ़ाती हुई।
घनघोर निराशा में पीठ थपथपाती
तुम्हारी परछाई-सी है ज़िंदगी।
दिवस को धकेलती-सी लगती
साँझ ढले लुटाती है अपनत्त्व।
कभी हर दिन का हिसाब माँगती
फिर अँधरे में गुम हो जाती है ज़िंदगी।
साँझ ढले लुटाती है अपनत्त्व।
कभी हर दिन का हिसाब माँगती
फिर अँधरे में गुम हो जाती है ज़िंदगी।
कभी आघात की बौछार करती
कभी अनुभव की सौग़ात थमाती
तुहिन कणों-सी चमक लिए आती
दामन में सिमट हर्षाती है ज़िंदगी।
कभी अनुभव की सौग़ात थमाती
तुहिन कणों-सी चमक लिए आती
दामन में सिमट हर्षाती है ज़िंदगी।
दिनभर की बनती है थकान
कभी अनायास मुस्कुराने लगती
तुम्हारे आने की आहट लिए
अरमान बन खिल जाती है ज़िंदगी।
कभी अनायास मुस्कुराने लगती
तुम्हारे आने की आहट लिए
अरमान बन खिल जाती है ज़िंदगी।
©अनीता सैनी 'दीप्ति'


