Powered By Blogger
ज़िंदगी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज़िंदगी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, अगस्त 7

ज़िंदगी


 मृगमरीचिका-सा भ्रम जाल फैलाती 
कभी धूप-सी जलाती है ज़िंदगी।
 बरसात बन भिगोती है कभी 
पेड़-सा आसरा बनती है ज़िंदगी।

सँकरी गलियों के मोड़-सी लगती 
 राह दिखाती है हाथ बढ़ाती हुई।
घनघोर निराशा में पीठ थपथपाती 
 तुम्हारी परछाई-सी है ज़िंदगी।

 दिवस को धकेलती-सी लगती 
 साँझ ढले लुटाती है अपनत्त्व।
कभी हर दिन का हिसाब माँगती
 फिर अँधरे में गुम हो जाती है ज़िंदगी।

 कभी आघात की बौछार करती 
 कभी अनुभव की सौग़ात थमाती
 तुहिन कणों-सी चमक लिए आती 
 दामन में सिमट हर्षाती है ज़िंदगी।

 दिनभर की बनती है थकान  
कभी अनायास मुस्कुराने लगती  
 तुम्हारे आने की आहट लिए  
अरमान बन खिल जाती है ज़िंदगी।


©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, जून 1

क़हर दिमाग़ ने ढा दिया



                                           
कृशकाय  पगडंडियों  पर  दौड़ते  गाँवों   को,  
 शहरों  की  सड़कें   निगल गयीं |

अपनेपन  की  ख़ुशबू   से  खिलखिलाती,  
गलियाँ  राह  शहर  की   भटक  गयीं|

 भूला    मिट्टी  की   ख़ुशबू ,
 शौहरत   की  महक दिल-ओ-दिमाग़  में  छा  गयीं  |

मासूम  दिल  पर  दिमाग़  ने  क़हर   ढा  दिया,  
छीन  पीपल  की  छाँव, फ़ुटपाथ  पर ज़िंदगी   सो  गयी |

 मालिकाना  हक़ का  रौब ,  मुस्कुराती  फ़सलें   छोड़ ,
बन  मज़दूर   मज़दूरी   को    मुहताज़, 
 वही   मेहनत   पगार  हाथों   में  थमा  गया |


कठघरे  में   जिंदगी, स्वाभिमान  की  पगड़ी  ले  गयी,  
दो  वक़्त  की  रोटी , नशे  का  व्यापारी  बना  गयी |


शब्दों   में   सुभाशीष,  हाथों  में   देश  का  भविष्य,   
बदली   शब्दों  की  लय,   लाचारी   सीने   से  लगा  गयी |


हुआ   घायल   मन ,  तन  ने   साथ   छोड़   दिया, 
नशे  ने   जकड़ा,    दीनता   हाथ   फैला   गयी |

सोई   मानवता  जाग  उठी,  धूम्रपान   से  तन  को  छुड़ा,  
इंसान   को   इंसानियत    का   पाठ   पढ़ा   गयी |

                      - अनीता सैनी

मंगलवार, मार्च 26

बोल चिड़िया के

                                                     
न रूठूँगी  तुम  से  ऐ-ज़िंदगी, 
बन मधुमास  मिलेंगे   दोबारा, 
लौटेंगे   हसीं  ख़्वाब, नक्षत्र बन, 
चमकेगा सौभाग्य का सितारा |

आँखों   में  उमड़े  स्वप्न  गूँथूँ,  
दमकना ज़िंदगी  तुम दुल्हन बनके, 
अस्तित्त्व अपना जताने उठना, 
 झलकना  आँखों  से  अश्रु-तारे  बनके | 

हो न अनहोनी का अंदेशा, 
तुम निर्भीक तेज़ हृदय को  पिला  देना,  
अटल पाषाण-सा वक़्त का साथ, 
 ज़िंदगी  के  हाथों   में  थमा  देना |

न  गुज़रेगें    फिर इस राह से, 
एक  घूँट  मोहब्बत  का ज़िंदगी  को पिला देना, 
पथ  नहीं यह  जीवन का, 
  प्रीतदीप  राह में  जला  देना |

दर्द का जीवन में बहे  दरिया, 
 ऐसा संचार  साँसों  में  बहा  देना,  
छूट रही  ज़िंदगी , बन सैकत, 
कुछ पल का ठहराव दिला देना |

तड़प रही  मानवता   एक  घूँट   अमृत   पिला  देना,  
थामे वक़्त  की  अँगुली  चलना   सिखा  देना |

काँच के टुकड़ों-सा बिखर रहा मानव, 
साँसों  की अहमियत ज़िंदगी  तुम  बता देना, 
तिमिर में छुपाया  मुँह, 
रो  रहा  तेज़  तुम अश्रु  पोंछ  देना |

    -अनीता सैनी