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सोमवार, जुलाई 29

हाँ यह वही सावन है



ज़ुल्म ! पवन के अल्हड़ झोंकों का,
कि  घटाएँ फिर ज़हन  में  उमड़  आयीं,
 चित्त ने दी चिंगारी,
एहसास फिर स्वप्न में सुलग आये, 
 भरी बरसात में जला,
  हाँ  यह  वही  सावन  है |


न धुँआ उठा, न धधका तन,
सपनों का वही जौहर है, जो  बेशुमार  जला,
बेलोश बेचैनियों में सिमटा बेसुध, 
प्रति पल  अलाव-सा जला,
हाँ  यह वही सावन है |

कुछ बुझा-सा,
कुछ  ना-उम्मीदी  में जला,
डगमगा रहे क़दम,
 फिर  ख़ामोशी से चला,
जीवन के उस पड़ाव पर,
सिसकियों ने सहलाया,
 हाँ  ता-उम्र जला यह वही सावन है |

 पलकों को भिगो ,
मुस्कुराहट के चिलमन  में  उलझ ,  
दिल के चमन को बंजर कर गया ,
 हसरतों का खिला फूल,
शोहरत  का  दे  लिबास,
भरी  महफ़िल में,
 अरमानों संग जला,
हाँ यह वही सावन है |


बेरहम भाग्य को भी न आया रहम,
 रूह-सा  रूह  को  तरसता मन,
एक अरसे तक सुलगा,
फिर भी न हुआ कम,
पेड़ की टहनियों से छन-छनकर जला,
हाँ  यह वही सावन है |

- अनीता सैनी

शनिवार, जून 1

क़हर दिमाग़ ने ढा दिया



                                           
कृशकाय  पगडंडियों  पर  दौड़ते  गाँवों   को,  
 शहरों  की  सड़कें   निगल गयीं |

अपनेपन  की  ख़ुशबू   से  खिलखिलाती,  
गलियाँ  राह  शहर  की   भटक  गयीं|

 भूला    मिट्टी  की   ख़ुशबू ,
 शौहरत   की  महक दिल-ओ-दिमाग़  में  छा  गयीं  |

मासूम  दिल  पर  दिमाग़  ने  क़हर   ढा  दिया,  
छीन  पीपल  की  छाँव, फ़ुटपाथ  पर ज़िंदगी   सो  गयी |

 मालिकाना  हक़ का  रौब ,  मुस्कुराती  फ़सलें   छोड़ ,
बन  मज़दूर   मज़दूरी   को    मुहताज़, 
 वही   मेहनत   पगार  हाथों   में  थमा  गया |


कठघरे  में   जिंदगी, स्वाभिमान  की  पगड़ी  ले  गयी,  
दो  वक़्त  की  रोटी , नशे  का  व्यापारी  बना  गयी |


शब्दों   में   सुभाशीष,  हाथों  में   देश  का  भविष्य,   
बदली   शब्दों  की  लय,   लाचारी   सीने   से  लगा  गयी |


हुआ   घायल   मन ,  तन  ने   साथ   छोड़   दिया, 
नशे  ने   जकड़ा,    दीनता   हाथ   फैला   गयी |

सोई   मानवता  जाग  उठी,  धूम्रपान   से  तन  को  छुड़ा,  
इंसान   को   इंसानियत    का   पाठ   पढ़ा   गयी |

                      - अनीता सैनी