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शुक्रवार, जुलाई 31

अनलिखी स्त्रियाँ


अनलिखी स्त्रियाँ
✍️ अनीता सैनी

सबसे कठिन है
उन स्त्रियों को पढ़ पाना
जिन्हें
लिखना नहीं आता।

दुःख का दाग
उनकी ओढ़नी पर नहीं,
आँखों में
रेत की महीन किरच-सा
अटका रहता है।

वे रास्ते नहीं नापतीं,
अपने ही चारों ओर
एक वृत्त रचती हैं।

उसी वृत्त में
उम्र
अपनी एड़ियाँ
धीरे-धीरे घिसती रहती है।

हर सुबह
एक नया दिन जन्म लेता है,
और हर रात
वे किसी अधूरी कविता के भीतर
धीरे-धीरे उतर जाती हैं—

जहाँ
हर दिन वे
एक नए उपन्यास की
अनकही नायिकाएँ होती हैं।

शुक्रवार, जुलाई 24

काई की पहली हरियाली


काई की पहली हरियाली
✍️ अनीता सैनी

……

मुझे किसी ने कोई नक्शा नहीं दिया।

फिर भी
हर मोड़ पर
मेरे हाथ में दिशा पूछ ली गई।

धीरे-धीरे
मेरी जेबों में
अनकहे कम्पास भरते गए।

मैं हर बार
थोड़ी-सी चुप्पी उठाती
और नदी
मुझे एक पत्थर और बना देती।

तलहटी में पड़े पत्थर
एक ही दिन में वहाँ नहीं पहुँचते।
उन्हें पानी
वर्षों तक
अपनी उँगलियों से
बीच धारा की ओर
सरकाता रहता है।

जब लोग कहते हैं-
"यह तो शुरू से ऐसी थी।"

मैं अपने भीतर
काई की पहली हरियाली छूती हूँ।

तब समझ में आता है-
मौन का पहला रंग
पानी नहीं-
लंबे समय तक
बिना पुकारे
समझते रहने से बनता है।

बुधवार, जुलाई 15

चाक की स्मृति


चाक की स्मृति

✍️ अनीता सैनी

…....

नदी के किनारे

सुराख़ लिए एक घड़ा

वर्षों तक

चुप पड़ा रहता है।


पर पानी की आहट

वह अब भी

सबसे पहले

पहचान लेता है।


उसकी देह की दरारों में

चाक की स्मृति

अब भी बची है।


लोग कहते हैं-

"वह टूट गया।"


पर वे यह नहीं कहते-


कि हर संध्या

एक नदी 

अपना थोड़ा-सा जल

उसकी ओर

सरका जाती है।


उसकी चुप्पी

एक छोटी-सी चिड़िया के लिए

डाल बन जाती है।

वह

क्षण-भर ठहरती है,

फिर उड़ जाती है।


और अँधेरा...


वह उसके भीतर

उतरता नहीं।


रात भर 

उसके पास बैठा रहता है।


सुबह होने पर

सबसे पहले

वहीं से

एक किरण उठती है।


वह

किसी छाँव की तलाश में नहीं है।


बहुत पहले

उसके भीतर

एक वृक्ष

उग आया था।