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मंगलवार, जून 23

प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं

प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं,
✍️अनीता सैनी 
……
प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं,
तब संसार वैसा नहीं रहता
जैसा पहले था।

सुबह की धूप ही नहीं,
हवा के साथ चौखट तक चली आई मिट्टी भी
अपनी लगने लगती है।

दूर तक जाते रास्ते
ऐसे लगते हैं,
जैसे उसी से मिलने निकल पड़े हों।

खिड़की की सलाखें,
दरवाज़े की कुंडी,
साँझ की पहली छाया
सब धीरे-धीरे
किसी एक नाम से भरने लगते हैं।

बरसता पानी
मानो किसी दूर बैठे मन का ताप
बूँद-बूँद पिघलकर
धरती पर उतर रहा हो।

रात की हवा
जब धीरे से पर्दे को छू जाती है,
तो लगता है
किसी ने बिना आवाज़ दिए
अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

धीरे-धीरे प्रतीक्षा
दूब-सी धरती पर फैल जाती है।

वह पेड़ों में बस जाती है,
रास्तों में, ऋतुओं में,
यहाँ तक कि घर की दीवारों में भी।

और फिर
वह आत्मा का स्वभाव बन जाती है।

आशा की धीमी लौ बनकर
वह भीतर कहीं जलती रहती है,
जिसे मन
दोनों हथेलियों में सँभाले रहता है।

उसके लिए
घर का एक दरवाज़ा,
एक रास्ता,
एक दीपक
और मन का एक कोना
उजाले को बचाए रखता है।

बुधवार, जून 17

रेत के पार…

रेत के पार…
✍️अनीता सैनी 

…..
वह मरुस्थल में उगा एक वृक्ष था,
जहाँ पानी
सिर्फ स्मृति में बचा था,
और छाँव
कभी-कभी
किसी थकी हुई व्यवस्था-सी
चुपचाप उतर आती थी
कुछ चुनिंदा शाखाओं पर।

यहाँ छाँव
सबके हिस्से में नहीं आती,
और हवा भी
अपने-अपने रास्तों से गुजर जाती।

जिन शाखों तक छाँव पहुँच जाती है,
वे धीरे-धीरे
रसूख़दार कहलाने लगते हैं
जैसे जीवन ने उन्हें
कोई अनकही अनुमति दे दी हो।

वृक्ष यह सब देखता था,
लेकिन भीतर कहीं
उसे स्वीकार करना आसान नहीं था।
कभी-कभी
उसकी शरण में आए पक्षी
खुद ही उड़ जाते,
और हिरनियाँ
धूप में ठिठककर रह जातीं
जैसे रेत से बातें कर रही हों।

गहरी धूप थी,
तपती रेत थी,
और ठहराव…
यहाँ बहुत देर टिक नहीं पाता था।

कुएँ की आवाज़ें
कब की खो चुकी थीं,
घड़ों की ठंडक
किसी पुरानी याद में ढल गई थी।

सब कुछ धीरे-धीरे सूख गया था
जड़ों समेत
वे सारे दरख़्त भी,
जिनकी छाँव में
पहचानें आकार लेती थीं।

अब जड़ें भी
अपनी ही मिट्टी से
धीरे-धीरे
छूटती हुई लगती थीं।

और रेत…
हर पदचिह्न को
याद बनने से पहले
मिटा देती थी।

शायद तभी,
कभी बहुत धीमे से
यह बात भीतर रह जाती है
कि
रेत पर चलना ही नहीं,
कभी-कभी
रेत के पार जाना भी
सीखा दिया जाता है।

बुधवार, जून 3

अनकहा जल


अनकहा जल
✍️ अनीता सैनी 
….

एक समय के बाद
देखने के लिए
अंधा हो जाना पड़ता है।

जल
अपनी पारदर्शिता में
तल नहीं देख पाता,
वैसे ही आँखें
दृश्य सँभालते-सँभालते
दृष्टि खो देती हैं।

गहराई में उतरने के लिए
चुपचाप बैठना पड़ता है
इतना चुप
कि भीतर गिरती
एक स्मृति की आवाज़ भी
अलग से सुनाई देने लगे।

पर वे अब भी कहते हैं-
बोलना आना ज़रूरी है।

कोई नहीं कहता
कि जीभ का हिलना
और शब्द का जन्म
दो अलग घटनाएँ हैं।

वर्षों से
मनुष्य अपने शब्द
कुओं में डालता रहा है
इतना
कि अब भूल गया है
जो प्रतिध्वनि लौटती है,
वह कुएँ की है
या उसी की अपनी
धीरे-धीरे पत्थराती आवाज़।

कभी लगता है
कुआँ ही मनुष्य को पुकार रहा है
अपनी गहराइयों में दबे
अनकहे जल की ओर…

और कभी लगता है
मनुष्य ही
अपने भीतर के सूखे को
वर्षों तक आवाज़ देता रहा,
पर हर बार
लौटकर वही सुनता रहा
जो उसने कभी कहा ही नहीं था।

शायद इसी तरह
एक दिन
शब्द
अपने कहने वाले से अलग हो जाते हैं

और फिर
कुएँ
मनुष्यों से अधिक
मनुष्य लगने लगते हैं।

मंगलवार, मई 19

अधखुला किवाड़


अधखुला किवाड़
✍️ अनीता सैनी
……
किसी वृक्ष का नाम नहीं लिखना,
न किसी ऋतु का।

इतना भर रहने देना
हर मुस्कान आश्रय नहीं होती,
और हर क्षमा
लौटना नहीं होती।

जो टूटता है
वह हमेशा दिखाई नहीं देता।
कुछ टूटनें
पहले से ही
आकाश की चुप्पी में लिखी होती हैं।

कई बार
एक चिड़िया का विश्वास टूटता है,
और आकाश
देर तक
अपनी ही आवाज़ नहीं पहचानता।

एक समय पर
उसने हवा को दोष दिया
सांकल की काँपती ध्वनि के लिए।
तब कहीं
यह आभास हुआ
कुछ आहटें बाहर नहीं,
भीतर जन्म लेती हैं।

वे इतनी भीतर धँस जाती हैं
कि स्मृतियाँ भी
उन ओर जाने से बचती हैं।

फिर भी
आवाज़ की महीन किरचें
आत्मा में कहीं
अटकी रह जाती हैं।

पर स्मृतियाँ
इतनी शांत कहाँ होती हैं
वे अँधेरे की तहों से
फिर वही स्वर उठा लाती हैं,
जिनके बाद
नींद बहुत हल्की हो जाती है।

और वह
पुरानी दीवार-सी
अपने भीतर की दरारों में
वही पदचिह्न टटोलने लगती है
जैसे भीतर
अब भी कोई किवाड़
अधखुला हो।

शनिवार, मई 9

धूप और छाँव के बीच


धूप और छाँव के बीच

✍️ अनीता सैनी


वृक्ष देखता है-

धूप, छाँव के खेल में

कौन कितना झरा,

और अंत में

किसके हिस्से बची धूप


वे

आते-जाते पाँव

कितने कँपे,

कितनी देर तक

ठहरी रही धरती,

और साँसें

पिघलकर

कितनी बह गईं।


प्रतीक्षा 

धीरे-धीरे

बिखरती रही

कठोर होती हुई भी

मिट्टी-सी नर्म रहकर

टूटती रही।


वह स्वयं

सहारा ढूँढ़ती रही

थोड़ा पत्थर हो जाने भर को।


पर समझ नहीं पाई

जीवन में अधिक पीड़ा

धूप देती है

या छाँव।


धूप

देह जलाती है,

पर छाँव

कभी-कभी भीतर उतरकर

टटोलती है

कि साँसें

अब भी बची हैं क्या,

प्राण

शेष हैं भी

या नहीं।


और तब लगता है

दुनिया में उतरना नहीं,

उतरने का अभिनय करना भर ही 

अब शेष रह गया है।


जैसे थका हुआ वृक्ष

अपने ही साये से पूछे-


“क्या सचमुच

मैं अब भी खड़ा हूँ?”

गुरुवार, मई 7

भात की गंध


भात की गंध
✍️ अनीता सैनी

‘था’
अक्सर
दीवारों पर चिपका रह जाता है
धुएँ की पतली परत बनकर,
जिसे बरसों बाद भी
उँगलियाँ छू लें
तो गंध लौट आती है।

और जो ‘होगा’
वह चौखटों पर टँगा रहता है
पुरानी चाबियों की तरह,
जिनसे
अब कोई दरवाज़ा नहीं खुलता,
पर स्त्रियाँ
उन्हें फेंकती भी नहीं हैं।

पर ‘है’
वह रसोई में
चुपचाप जलती आँच की तरह होता है,
जिस पर
भात सुबह-शाम पकता रहता है।

भात उफ़नता है
पानी के साथ
बार-बार बाहर झाँकता है,
पर कोई कवि
ढक्कन पूरा नहीं हटाता
वह
किनारे से
थोड़ा सरकाकर देखता है
कि भात कितने पके हैं।

कुछ कविताओं में
जले भात की गंध लौटती है,
कुछ में
अधपके दानों की कड़वाहट।

पर ‘है’
धीमे-धीमे देर तक 
सबसे अधिक जलता है,
और सबसे कम दर्ज होता है।

जली लकड़ी की राख की तरह,
जिसे
चूल्हे से उठाकर
चुपचाप बाहर फेंक दिया जाता है।

रविवार, अप्रैल 26

प्रतीक्षा से परे


प्रतीक्षा से परे

✍️ अनीता सैनी


नदी के किनारे

बैठे रहना वर्षों तक 

प्रतीक्षा को साधना समझकर।


फिर एक दिन जाना

प्रतीक्षा

धीरे-धीरे धड़कनों को

पत्थर की चुप्पी में बदल देती है,

और करुणा

उसी पत्थर की दरारों से

फिर जल का रास्ता खोज लेती है।


विरह लिखा गया,

पीड़ा भी

और अंत में

एक सूखी पत्ती-सा लिख दिया गया

कि कुछ भी स्थायी नहीं होता।


न अपमान,

न प्रेम का आग्रह,

न ही वह आवाज़

जो दीवारों में गूँजकर

वापस लौट आती थी।


सब चुपचाप

समय की धारा में घुल जाता है

जैसे पगडंडी पर ठहरा पानी

धूप की पहली किरण में

बिना शोर सूख जाता है।


बस एक हल्की-सी नमी बचती है

चलते रहने की,

बिना पीछे देखे।


अब

कुछ नहीं किया जाता

न समझा जाता है,

न समझाया जाता है,

न माँगा जाता है,

न किसी को दोष दिया जाता है।

बस देखा जाता है

जैसे पेड़

ऋतुओं के आने-जाने को

अपनी जड़ों में दर्ज करते हैं,

जैसे नदी

किनारों को छूकर भी

उन्हें अपने साथ नहीं बाँधती।


भीतर अब

एक करुणा बहती है

निर्विकार, निरंतर

पत्थरों के लिए भी,

काँटों के लिए भी,

और उन हाथों के लिए भी

जिन्होंने छूकर

अपना कठोर होना सीखा था।


अब जाना गया है

दुनिया बाहर नहीं,

भीतर उगती है

मौन की मिट्टी में,

अनुभव की धूप में।


और वही भीतर का संसार

हर दिन

थोड़ा-थोड़ा परोसा जाता है

रोटी के साथ,

एक लंबी चुप्पी के साथ,

और उस मुस्कान के साथ

जिसमें अब कोई दावा नहीं,

कोई प्रतीक्षा नहीं

सिर्फ स्वीकृति की शांति है।


अब

डायरी में शब्द नहीं उतरते

बस

धीरे-धीरे

भीतर से बाहर

एक आकाश फैलता जाता है।


शनिवार, अप्रैल 18

धूप के माथे पर खिला एक फूल



धूप के
माथे पर खिला एक फूल

✍️ अनीता सैनी
…….
मरुस्थल में
जो प्यास लिए दौड़ती है,
वह मृगमरीचिका नहीं 
धूप के माथे पर
खिला एक फूल है।

पंखुड़ियों में उजास,
जड़ों में रेत की चुप्पी
पानी नहीं,
समय ही
रेत में उतरता है।

खेजड़ी-सा जीवन
धूप में भी
हरापन छुपाए रहता है।

नियति ने
उसके त्याग को ही
जल मान लिया है
उसे
वहीं रहने देना ही
शायद उसका जल है।

आकाश की ओर खुला,
जहाँ
सूरज से रंग उतरते हैं,
वह
गिरती हुई रोशनी के टुकड़ों में भी
अधूरा नहीं दिखता।

जड़ों तक मत जाना…
वहाँ
एक सूखा कुआँ है,
जहाँ प्रतीक्षाएँ
पानी नहीं,
रेत बनकर जम गई हैं।

वह फूल
भीतर से नहीं खिलता
धूप ही उसकी नमी है,
वही
उसे भीतर से सींचती है।

उसका प्रेम
ओस नहीं माँगता,
बस चुपचाप
समर्पित है,
और धीरे-धीरे
किसी और के उजाले में
अपना नाम
खो देता है।

यह भोग नहीं,
यह
कविता की देह है
जो छुई नहीं जाती,
बस जी जाती है।

अंत में
कुछ भी नहीं बचता,
सिवाय
एक फूल के
जो
धूप के माथे पर
अब भी
खिला है।

बुधवार, अप्रैल 8

मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा


मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा

✍️ अनीता सैनी

……

कविता के भीतर

एक सूखी नदी में

रात का बासी पानी उँडेला गया था।


दलदल

बारिश का नहीं,

ठहरे आँसुओं का घर है।


कविता की काया पर

खरोंचें नहीं,

पर भीतर

एक जंगल है

जहाँ हर पेड़

किसी नाम से घायल है

पर कुछ नाम

अब  पुकारे नहीं जाते।


धूप से मुँह मोड़ा गया,

छाँव पुकार ली गई,

और वही छाँव

धीरे-धीरे

एक लंबी, ठंडी सुरंग बन गई।


अब

उसी में बैठा है कोई,

जहाँ आवाज़

अपने ही कदमों से डरती है।


सपनों के घड़े

कभी भरे ही नहीं गए,

उनमें दरारें उकेरी गईं

कि कहीं भर गए

तो बह न निकलें।


और अब हथेलियों में

 बस

रेत बची है,

जो

हर बार छूट जाती है।


हार है

किसी युद्ध की नहीं,

भीतर के

धीरे-धीरे हारते

विश्वास की।


डूबना है

समंदर का नहीं,

उस कुएँ का

जो चारों ओर

खुद ही खोदा गया।


अब

किनारे नहीं खोजे जाते,

बस

अँधेरा कंधों पर रखकर

इतना भर कहा जाता है

यह रात

किसी और की नहीं,

सींची गई थी

यही मेरी कमाई है।