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मंगलवार, अगस्त 18

आठवाँ पहर


आठवाँ पहर 
✍️अनीता सैनी 
......

कई सौ साल पहले
सदी का आख़िरी ग्रहण उतरा
सूरज के पाँव में
कालिख उतर आई
और एक पहर
समय से बाहर सूख गया।

उसके पाँव
पानी पर उतरे
और
लहरों की देह पर
काले अक्षर छोड़ गए।

दूधिया चाँदनी में नहाया
चाँद
कुएँ की जगत देखता रहा।

कुएँ ने
ख़ुद को नहीं उल्टा,
मटका
पानी बदलता रहा।

सारे पत्ते
ख़त हो गए थे
काग नहीं,
एक सफ़ेद कबूतर
छत पर उतरा।

और
एक थका हुआ दिन
रात में डूब गया।

उसकी देह
काली पड़ती रही।

और मैं
तुलसी पत्ते निगलती रही।

सोमवार, अगस्त 10

पीठ पर परछाई

पीठ पर परछाई

✍️ अनीता सैनी

…….

मैंने सपने नहीं देखे।


मेरे पास

कल्पना की तितली नहीं थी,

सच का

डोलता बड़ा-सा बादल था।


मेरे भार से

दुगुना।


मैं उसे

अपने साथ ढोती रही,


बिना यह कहे

कि उसकी छाया में

मेरी कल्पना

कितनी देर तक

साँस रोककर बैठी रही।


मैंने रूढ़ियाँ नहीं देखीं,

उनकी परछाइयाँ देखीं।


मुझसे एक कदम

पहले चलने वाली स्त्रियों 

की
पीठ पर

उनकी परछाइयाँ थीं।


वे कहती थीं,

रूढ़ियाँ गढ़ने वाला

अपनी ही बनाई अँधेरी जगह में

खड़ा था।


बस।


मैंने उसे

कल्पना नहीं कहा।

शुक्रवार, जुलाई 31

अनलिखी स्त्रियाँ


अनलिखी स्त्रियाँ
✍️ अनीता सैनी

सबसे कठिन है
उन स्त्रियों को पढ़ पाना
जिन्हें
लिखना नहीं आता।

दुःख का दाग
उनकी ओढ़नी पर नहीं,
आँखों में
रेत की महीन किरच-सा
अटका रहता है।

वे रास्ते नहीं नापतीं,
अपने ही चारों ओर
एक वृत्त रचती हैं।

उसी वृत्त में
उम्र
अपनी एड़ियाँ
धीरे-धीरे घिसती रहती है।

हर सुबह
एक नया दिन जन्म लेता है,
और हर रात
वे किसी अधूरी कविता के भीतर
धीरे-धीरे उतर जाती हैं—

जहाँ
हर दिन वे
एक नए उपन्यास की
अनकही नायिकाएँ होती हैं।

शुक्रवार, जुलाई 24

काई की पहली हरियाली


काई की पहली हरियाली
✍️ अनीता सैनी

……

मुझे किसी ने कोई नक्शा नहीं दिया।

फिर भी
हर मोड़ पर
मेरे हाथ में दिशा पूछ ली गई।

धीरे-धीरे
मेरी जेबों में
अनकहे कम्पास भरते गए।

मैं हर बार
थोड़ी-सी चुप्पी उठाती
और नदी
मुझे एक पत्थर और बना देती।

तलहटी में पड़े पत्थर
एक ही दिन में वहाँ नहीं पहुँचते।
उन्हें पानी
वर्षों तक
अपनी उँगलियों से
बीच धारा की ओर
सरकाता रहता है।

जब लोग कहते हैं-
"यह तो शुरू से ऐसी थी।"

मैं अपने भीतर
काई की पहली हरियाली छूती हूँ।

तब समझ में आता है-
मौन का पहला रंग
पानी नहीं-
लंबे समय तक
बिना पुकारे
समझते रहने से बनता है।

बुधवार, जुलाई 15

चाक की स्मृति


चाक की स्मृति

✍️ अनीता सैनी

…....

नदी के किनारे

सुराख़ लिए एक घड़ा

वर्षों तक

चुप पड़ा रहता है।


पर पानी की आहट

वह अब भी

सबसे पहले

पहचान लेता है।


उसकी देह की दरारों में

चाक की स्मृति

अब भी बची है।


लोग कहते हैं-

"वह टूट गया।"


पर वे यह नहीं कहते-


कि हर संध्या

एक नदी 

अपना थोड़ा-सा जल

उसकी ओर

सरका जाती है।


उसकी चुप्पी

एक छोटी-सी चिड़िया के लिए

डाल बन जाती है।

वह

क्षण-भर ठहरती है,

फिर उड़ जाती है।


और अँधेरा...


वह उसके भीतर

उतरता नहीं।


रात भर 

उसके पास बैठा रहता है।


सुबह होने पर

सबसे पहले

वहीं से

एक किरण उठती है।


वह

किसी छाँव की तलाश में नहीं है।


बहुत पहले

उसके भीतर

एक वृक्ष

उग आया था।

मंगलवार, जून 23

प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं

प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं,
✍️अनीता सैनी 
……
प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं,
तब संसार वैसा नहीं रहता
जैसा पहले था।

सुबह की धूप ही नहीं,
हवा के साथ चौखट तक चली आई मिट्टी भी
अपनी लगने लगती है।

दूर तक जाते रास्ते
ऐसे लगते हैं,
जैसे उसी से मिलने निकल पड़े हों।

खिड़की की सलाखें,
दरवाज़े की कुंडी,
साँझ की पहली छाया
सब धीरे-धीरे
किसी एक नाम से भरने लगते हैं।

बरसता पानी
मानो किसी दूर बैठे मन का ताप
बूँद-बूँद पिघलकर
धरती पर उतर रहा हो।

रात की हवा
जब धीरे से पर्दे को छू जाती है,
तो लगता है
किसी ने बिना आवाज़ दिए
अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

धीरे-धीरे प्रतीक्षा
दूब-सी धरती पर फैल जाती है।

वह पेड़ों में बस जाती है,
रास्तों में, ऋतुओं में,
यहाँ तक कि घर की दीवारों में भी।

और फिर
वह आत्मा का स्वभाव बन जाती है।

आशा की धीमी लौ बनकर
वह भीतर कहीं जलती रहती है,
जिसे मन
दोनों हथेलियों में सँभाले रहता है।

उसके लिए
घर का एक दरवाज़ा,
एक रास्ता,
एक दीपक
और मन का एक कोना
उजाले को बचाए रखता है।

बुधवार, जून 17

रेत के पार…

रेत के पार…
✍️अनीता सैनी 

…..
वह मरुस्थल में उगा एक वृक्ष था,
जहाँ पानी
सिर्फ स्मृति में बचा था,
और छाँव
कभी-कभी
किसी थकी हुई व्यवस्था-सी
चुपचाप उतर आती थी
कुछ चुनिंदा शाखाओं पर।

यहाँ छाँव
सबके हिस्से में नहीं आती,
और हवा भी
अपने-अपने रास्तों से गुजर जाती।

जिन शाखों तक छाँव पहुँच जाती है,
वे धीरे-धीरे
रसूख़दार कहलाने लगते हैं
जैसे जीवन ने उन्हें
कोई अनकही अनुमति दे दी हो।

वृक्ष यह सब देखता था,
लेकिन भीतर कहीं
उसे स्वीकार करना आसान नहीं था।
कभी-कभी
उसकी शरण में आए पक्षी
खुद ही उड़ जाते,
और हिरनियाँ
धूप में ठिठककर रह जातीं
जैसे रेत से बातें कर रही हों।

गहरी धूप थी,
तपती रेत थी,
और ठहराव…
यहाँ बहुत देर टिक नहीं पाता था।

कुएँ की आवाज़ें
कब की खो चुकी थीं,
घड़ों की ठंडक
किसी पुरानी याद में ढल गई थी।

सब कुछ धीरे-धीरे सूख गया था
जड़ों समेत
वे सारे दरख़्त भी,
जिनकी छाँव में
पहचानें आकार लेती थीं।

अब जड़ें भी
अपनी ही मिट्टी से
धीरे-धीरे
छूटती हुई लगती थीं।

और रेत…
हर पदचिह्न को
याद बनने से पहले
मिटा देती थी।

शायद तभी,
कभी बहुत धीमे से
यह बात भीतर रह जाती है
कि
रेत पर चलना ही नहीं,
कभी-कभी
रेत के पार जाना भी
सीखा दिया जाता है।

बुधवार, जून 3

अनकहा जल


अनकहा जल
✍️ अनीता सैनी 
….

एक समय के बाद
देखने के लिए
अंधा हो जाना पड़ता है।

जल
अपनी पारदर्शिता में
तल नहीं देख पाता,
वैसे ही आँखें
दृश्य सँभालते-सँभालते
दृष्टि खो देती हैं।

गहराई में उतरने के लिए
चुपचाप बैठना पड़ता है
इतना चुप
कि भीतर गिरती
एक स्मृति की आवाज़ भी
अलग से सुनाई देने लगे।

पर वे अब भी कहते हैं-
बोलना आना ज़रूरी है।

कोई नहीं कहता
कि जीभ का हिलना
और शब्द का जन्म
दो अलग घटनाएँ हैं।

वर्षों से
मनुष्य अपने शब्द
कुओं में डालता रहा है
इतना
कि अब भूल गया है
जो प्रतिध्वनि लौटती है,
वह कुएँ की है
या उसी की अपनी
धीरे-धीरे पत्थराती आवाज़।

कभी लगता है
कुआँ ही मनुष्य को पुकार रहा है
अपनी गहराइयों में दबे
अनकहे जल की ओर…

और कभी लगता है
मनुष्य ही
अपने भीतर के सूखे को
वर्षों तक आवाज़ देता रहा,
पर हर बार
लौटकर वही सुनता रहा
जो उसने कभी कहा ही नहीं था।

शायद इसी तरह
एक दिन
शब्द
अपने कहने वाले से अलग हो जाते हैं

और फिर
कुएँ
मनुष्यों से अधिक
मनुष्य लगने लगते हैं।

मंगलवार, मई 19

अधखुला किवाड़


अधखुला किवाड़
✍️ अनीता सैनी
……
किसी वृक्ष का नाम नहीं लिखना,
न किसी ऋतु का।

इतना भर रहने देना
हर मुस्कान आश्रय नहीं होती,
और हर क्षमा
लौटना नहीं होती।

जो टूटता है
वह हमेशा दिखाई नहीं देता।
कुछ टूटनें
पहले से ही
आकाश की चुप्पी में लिखी होती हैं।

कई बार
एक चिड़िया का विश्वास टूटता है,
और आकाश
देर तक
अपनी ही आवाज़ नहीं पहचानता।

एक समय पर
उसने हवा को दोष दिया
सांकल की काँपती ध्वनि के लिए।
तब कहीं
यह आभास हुआ
कुछ आहटें बाहर नहीं,
भीतर जन्म लेती हैं।

वे इतनी भीतर धँस जाती हैं
कि स्मृतियाँ भी
उन ओर जाने से बचती हैं।

फिर भी
आवाज़ की महीन किरचें
आत्मा में कहीं
अटकी रह जाती हैं।

पर स्मृतियाँ
इतनी शांत कहाँ होती हैं
वे अँधेरे की तहों से
फिर वही स्वर उठा लाती हैं,
जिनके बाद
नींद बहुत हल्की हो जाती है।

और वह
पुरानी दीवार-सी
अपने भीतर की दरारों में
वही पदचिह्न टटोलने लगती है
जैसे भीतर
अब भी कोई किवाड़
अधखुला हो।