Powered By Blogger
धधक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धधक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, जुलाई 29

हाँ यह वही सावन है



ज़ुल्म ! पवन के अल्हड़ झोंकों का,
कि  घटाएँ फिर ज़हन  में  उमड़  आयीं,
 चित्त ने दी चिंगारी,
एहसास फिर स्वप्न में सुलग आये, 
 भरी बरसात में जला,
  हाँ  यह  वही  सावन  है |


न धुँआ उठा, न धधका तन,
सपनों का वही जौहर है, जो  बेशुमार  जला,
बेलोश बेचैनियों में सिमटा बेसुध, 
प्रति पल  अलाव-सा जला,
हाँ  यह वही सावन है |

कुछ बुझा-सा,
कुछ  ना-उम्मीदी  में जला,
डगमगा रहे क़दम,
 फिर  ख़ामोशी से चला,
जीवन के उस पड़ाव पर,
सिसकियों ने सहलाया,
 हाँ  ता-उम्र जला यह वही सावन है |

 पलकों को भिगो ,
मुस्कुराहट के चिलमन  में  उलझ ,  
दिल के चमन को बंजर कर गया ,
 हसरतों का खिला फूल,
शोहरत  का  दे  लिबास,
भरी  महफ़िल में,
 अरमानों संग जला,
हाँ यह वही सावन है |


बेरहम भाग्य को भी न आया रहम,
 रूह-सा  रूह  को  तरसता मन,
एक अरसे तक सुलगा,
फिर भी न हुआ कम,
पेड़ की टहनियों से छन-छनकर जला,
हाँ  यह वही सावन है |

- अनीता सैनी