काई की पहली हरियाली
✍️ अनीता सैनी
……
मुझे किसी ने कोई नक्शा नहीं दिया।
फिर भी
हर मोड़ पर
मेरे हाथ में दिशा पूछ ली गई।
धीरे-धीरे
मेरी जेबों में
अनकहे कम्पास भरते गए।
मैं हर बार
थोड़ी-सी चुप्पी उठाती
और नदी
मुझे एक पत्थर और बना देती।
तलहटी में पड़े पत्थर
एक ही दिन में वहाँ नहीं पहुँचते।
उन्हें पानी
वर्षों तक
अपनी उँगलियों से
बीच धारा की ओर
सरकाता रहता है।
जब लोग कहते हैं-
"यह तो शुरू से ऐसी थी।"
मैं अपने भीतर
काई की पहली हरियाली छूती हूँ।
तब समझ में आता है-
मौन का पहला रंग
पानी नहीं-
लंबे समय तक
बिना पुकारे
समझते रहने से बनता है।

बढ़िया।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 26 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
शानदार
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
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