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शुक्रवार, मई 22

श्रमजीवी श्रम धावक


कुछ परछाइयाँ मायूस हुईं !
कुछ शीश टिकाए बैठीं घुटनों पर 
कुछ बौराई-सी नम आँखों से 
पथरीले पथ पर टहल रहीं।  

 घने अंधियारे में तितर-बितर 
कुछ दौड़ जीवन की लगा रहीं। 
पथराई आँखों से 
कुछ ज़िंदगी जग में ढूँढ़ रहीं। 

टहल-क़दमी की नहीं आवाज़ 
प्रत्यक्ष नहीं परछाई किसकी 
कैसी कौन रहीं वो? 
सदियों से नहीं ढोई  हृदय ने 
ऐसी पीड़ा ढो रहीं वह।  
व्यथित मन की व्याकुलता 
बहुतेरी सांसों पर डोल रहीं।  

क्रमबद्ध  संयम  संभाले 
बढ़ाती क़दम बारंबार। 
बेबस बेसहारा मजबूर नहीं 
यही बोल रही वो। 
नेता, राजनेता, अभिनेता-सा 
अभिनय नहीं 
श्रमजीवी श्रम धावक श्वेद संग 
बतियाती वो। 

निगलना चाहता उन्मुख काल 
लिए धूप-पानी का वार 
असहाय होने का नहीं गढ़ती 
फिर भी सुंदर स्वाँग वो। 
सामर्थ्य सहेजे सद्भावना 
फलीभूत भुजाओं में  
माणस निवाले से नहीं भरती 
 जीवन उड़ान वो। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'