Powered By Blogger

मंगलवार, मई 19

अधखुला किवाड़


अधखुला किवाड़
✍️ अनीता सैनी
……
किसी वृक्ष का नाम नहीं लिखना,
न किसी ऋतु का।

इतना भर रहने देना
हर मुस्कान आश्रय नहीं होती,
और हर क्षमा
लौटना नहीं होती।

जो टूटता है
वह हमेशा दिखाई नहीं देता।
कुछ टूटनें
पहले से ही
आकाश की चुप्पी में लिखी होती हैं।

कई बार
एक चिड़िया का विश्वास टूटता है,
और आकाश
देर तक
अपनी ही आवाज़ नहीं पहचानता।

एक समय पर
उसने हवा को दोष दिया
सांकल की काँपती ध्वनि के लिए।
तब कहीं
यह आभास हुआ
कुछ आहटें बाहर नहीं,
भीतर जन्म लेती हैं।

वे इतनी भीतर धँस जाती हैं
कि स्मृतियाँ भी
उन ओर जाने से बचती हैं।

फिर भी
आवाज़ की महीन किरचें
आत्मा में कहीं
अटकी रह जाती हैं।

पर स्मृतियाँ
इतनी शांत कहाँ होती हैं
वे अँधेरे की तहों से
फिर वही स्वर उठा लाती हैं,
जिनके बाद
नींद बहुत हल्की हो जाती है।

और वह
पुरानी दीवार-सी
अपने भीतर की दरारों में
वही पदचिह्न टटोलने लगती है
जैसे भीतर
अब भी कोई किवाड़
अधखुला हो।

शनिवार, मई 9

धूप और छाँव के बीच


धूप और छाँव के बीच

✍️ अनीता सैनी


वृक्ष देखता है-

धूप, छाँव के खेल में

कौन कितना झरा,

और अंत में

किसके हिस्से बची धूप


वे

आते-जाते पाँव

कितने कँपे,

कितनी देर तक

ठहरी रही धरती,

और साँसें

पिघलकर

कितनी बह गईं।


प्रतीक्षा 

धीरे-धीरे

बिखरती रही

कठोर होती हुई भी

मिट्टी-सी नर्म रहकर

टूटती रही।


वह स्वयं

सहारा ढूँढ़ती रही

थोड़ा पत्थर हो जाने भर को।


पर समझ नहीं पाई

जीवन में अधिक पीड़ा

धूप देती है

या छाँव।


धूप

देह जलाती है,

पर छाँव

कभी-कभी भीतर उतरकर

टटोलती है

कि साँसें

अब भी बची हैं क्या,

प्राण

शेष हैं भी

या नहीं।


और तब लगता है

दुनिया में उतरना नहीं,

उतरने का अभिनय करना भर ही 

अब शेष रह गया है।


जैसे थका हुआ वृक्ष

अपने ही साये से पूछे-


“क्या सचमुच

मैं अब भी खड़ा हूँ?”

गुरुवार, मई 7

भात की गंध


भात की गंध
✍️ अनीता सैनी

‘था’
अक्सर
दीवारों पर चिपका रह जाता है
धुएँ की पतली परत बनकर,
जिसे बरसों बाद भी
उँगलियाँ छू लें
तो गंध लौट आती है।

और जो ‘होगा’
वह चौखटों पर टँगा रहता है
पुरानी चाबियों की तरह,
जिनसे
अब कोई दरवाज़ा नहीं खुलता,
पर स्त्रियाँ
उन्हें फेंकती भी नहीं हैं।

पर ‘है’
वह रसोई में
चुपचाप जलती आँच की तरह होता है,
जिस पर
भात सुबह-शाम पकता रहता है।

भात उफ़नता है
पानी के साथ
बार-बार बाहर झाँकता है,
पर कोई कवि
ढक्कन पूरा नहीं हटाता
वह
किनारे से
थोड़ा सरकाकर देखता है
कि भात कितने पके हैं।

कुछ कविताओं में
जले भात की गंध लौटती है,
कुछ में
अधपके दानों की कड़वाहट।

पर ‘है’
धीमे-धीमे देर तक 
सबसे अधिक जलता है,
और सबसे कम दर्ज होता है।

जली लकड़ी की राख की तरह,
जिसे
चूल्हे से उठाकर
चुपचाप बाहर फेंक दिया जाता है।

रविवार, अप्रैल 26

प्रतीक्षा से परे


प्रतीक्षा से परे

✍️ अनीता सैनी


नदी के किनारे

बैठे रहना वर्षों तक 

प्रतीक्षा को साधना समझकर।


फिर एक दिन जाना

प्रतीक्षा

धीरे-धीरे धड़कनों को

पत्थर की चुप्पी में बदल देती है,

और करुणा

उसी पत्थर की दरारों से

फिर जल का रास्ता खोज लेती है।


विरह लिखा गया,

पीड़ा भी

और अंत में

एक सूखी पत्ती-सा लिख दिया गया

कि कुछ भी स्थायी नहीं होता।


न अपमान,

न प्रेम का आग्रह,

न ही वह आवाज़

जो दीवारों में गूँजकर

वापस लौट आती थी।


सब चुपचाप

समय की धारा में घुल जाता है

जैसे पगडंडी पर ठहरा पानी

धूप की पहली किरण में

बिना शोर सूख जाता है।


बस एक हल्की-सी नमी बचती है

चलते रहने की,

बिना पीछे देखे।


अब

कुछ नहीं किया जाता

न समझा जाता है,

न समझाया जाता है,

न माँगा जाता है,

न किसी को दोष दिया जाता है।

बस देखा जाता है

जैसे पेड़

ऋतुओं के आने-जाने को

अपनी जड़ों में दर्ज करते हैं,

जैसे नदी

किनारों को छूकर भी

उन्हें अपने साथ नहीं बाँधती।


भीतर अब

एक करुणा बहती है

निर्विकार, निरंतर

पत्थरों के लिए भी,

काँटों के लिए भी,

और उन हाथों के लिए भी

जिन्होंने छूकर

अपना कठोर होना सीखा था।


अब जाना गया है

दुनिया बाहर नहीं,

भीतर उगती है

मौन की मिट्टी में,

अनुभव की धूप में।


और वही भीतर का संसार

हर दिन

थोड़ा-थोड़ा परोसा जाता है

रोटी के साथ,

एक लंबी चुप्पी के साथ,

और उस मुस्कान के साथ

जिसमें अब कोई दावा नहीं,

कोई प्रतीक्षा नहीं

सिर्फ स्वीकृति की शांति है।


अब

डायरी में शब्द नहीं उतरते

बस

धीरे-धीरे

भीतर से बाहर

एक आकाश फैलता जाता है।


शनिवार, अप्रैल 18

धूप के माथे पर खिला एक फूल



धूप के
माथे पर खिला एक फूल

✍️ अनीता सैनी
…….
मरुस्थल में
जो प्यास लिए दौड़ती है,
वह मृगमरीचिका नहीं 
धूप के माथे पर
खिला एक फूल है।

पंखुड़ियों में उजास,
जड़ों में रेत की चुप्पी
पानी नहीं,
समय ही
रेत में उतरता है।

खेजड़ी-सा जीवन
धूप में भी
हरापन छुपाए रहता है।

नियति ने
उसके त्याग को ही
जल मान लिया है
उसे
वहीं रहने देना ही
शायद उसका जल है।

आकाश की ओर खुला,
जहाँ
सूरज से रंग उतरते हैं,
वह
गिरती हुई रोशनी के टुकड़ों में भी
अधूरा नहीं दिखता।

जड़ों तक मत जाना…
वहाँ
एक सूखा कुआँ है,
जहाँ प्रतीक्षाएँ
पानी नहीं,
रेत बनकर जम गई हैं।

वह फूल
भीतर से नहीं खिलता
धूप ही उसकी नमी है,
वही
उसे भीतर से सींचती है।

उसका प्रेम
ओस नहीं माँगता,
बस चुपचाप
समर्पित है,
और धीरे-धीरे
किसी और के उजाले में
अपना नाम
खो देता है।

यह भोग नहीं,
यह
कविता की देह है
जो छुई नहीं जाती,
बस जी जाती है।

अंत में
कुछ भी नहीं बचता,
सिवाय
एक फूल के
जो
धूप के माथे पर
अब भी
खिला है।

बुधवार, अप्रैल 8

मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा


मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा

✍️ अनीता सैनी

……

कविता के भीतर

एक सूखी नदी में

रात का बासी पानी उँडेला गया था।


दलदल

बारिश का नहीं,

ठहरे आँसुओं का घर है।


कविता की काया पर

खरोंचें नहीं,

पर भीतर

एक जंगल है

जहाँ हर पेड़

किसी नाम से घायल है

पर कुछ नाम

अब  पुकारे नहीं जाते।


धूप से मुँह मोड़ा गया,

छाँव पुकार ली गई,

और वही छाँव

धीरे-धीरे

एक लंबी, ठंडी सुरंग बन गई।


अब

उसी में बैठा है कोई,

जहाँ आवाज़

अपने ही कदमों से डरती है।


सपनों के घड़े

कभी भरे ही नहीं गए,

उनमें दरारें उकेरी गईं

कि कहीं भर गए

तो बह न निकलें।


और अब हथेलियों में

 बस

रेत बची है,

जो

हर बार छूट जाती है।


हार है

किसी युद्ध की नहीं,

भीतर के

धीरे-धीरे हारते

विश्वास की।


डूबना है

समंदर का नहीं,

उस कुएँ का

जो चारों ओर

खुद ही खोदा गया।


अब

किनारे नहीं खोजे जाते,

बस

अँधेरा कंधों पर रखकर

इतना भर कहा जाता है

यह रात

किसी और की नहीं,

सींची गई थी

यही मेरी कमाई है।

मंगलवार, मार्च 31

बाबा, अब तुम सो जाया करो


बाबा, अब तुम सो जाया करो
✍️ अनीता सैनी
…..
बाबा,
अब तुम सुकून से सो जाया करो।
रात को आँगन में
जब चाँद उतर आए,
तो उसकी चुप्पी
ओढ़ लिया करो।

दो वक़्त की रोटी
पेट भर खा लिया करो
अब मैं तुम्हारी थाली की
आख़िरी रोटी नहीं रही,
जो तुम चुपके से
मेरे हिस्से में सरका देते थे।

बाबा,
ज़िंदगी की लकीर
कुएँ के जल-सी नहीं,
हथेलियों की दरारों-सी होती है
चुपचाप रिसती रहती है।

मेरी फ़िक्र छोड़ दो,
अब तुम निश्चिंत हो जाया करो।

तुम कहते थे
“चार अक्षर पढ़ लेगी
तो दुनिया समझ जाएगी…”
देखो बाबा,
मैंने सच में
जीवन पढ़ लिया है।

अब कोई ठग
मेरी आँखों में धूप भरकर
मुझसे मेरा आकाश
नहीं छीन सकता।

तुम्हें आज भी
सब्ज़ी के भाव चुभते होंगे,
पर तुम्हारी बेटी
अब भी
प्याज़-रोटी में भी
अपना स्वाद पा लेती है।

मैंने सिर पर
एक आसमान ओढ़ लिया है, बाबा
अब बादल गरजते हैं
तो भीतर कुछ नहीं काँपता।

तुम देखना,
दो पग ज़मीन भी
धीरे-धीरे जोड़ ही लूँगी।
तुमने जैसे
रेत में पसीना बोकर
घर उगाया था
एक दिन
मैं भी उगा ही लूँगी।

और हाँ बाबा,
वो…
मेरे सिर पर हाथ रखता है,
और उस स्पर्श में
तुम्हारी उँगलियों की गरमी
अब भी बाकी है।

अब तुम
सर उठाकर चला करो।
आकाश में
आजकल तारे बहुत साफ़ दिखते हैं
जैसे किसी ने
पुरानी धूल झाड़ दी हो।
और जब भी
नींद आँखों से रूठे,
तो समझ लेना
तुम्हारी बेटी
अपने हिस्से की जाग
तुम्हारे लिए जी रही है।

अब सच में
सो जाया करो, बाबा
तुम्हारी सारी चिंताएँ
मैंने अपने आँगन की खूँटी पर
बाँध दी हैं।

गुरुवार, मार्च 26

ठीक पहले


ठीक पहले
✍️ अनीता सैनी 
……

ऐसा नहीं है
कि उसे लिखना नहीं आया
स्त्रियाँ बहुत कम लिखती हैं
वे बस जीती हैं।

मोक्ष के द्वार पर
सबसे पहले
पहुँची स्त्री के
पाँवों में आज भी अतीत की धूल है,
आँखों में
अनगिनत जन्मों की थकान,
और हथेलियों में
किसी और के सपनों की रेखाएँ।

वह अपने रास्ते की कथा
पीड़ा की स्याही से
लिख सकती थी
धरती को शब्दों से भर सकती थी,
पर उसने
मौन को ही
अपना आख्यान
लिखने दिया।

उसने पुरुष को
सीने से लगाया
जैसे कोई वृक्ष
आकाश को थाम लेता है,
और उसी क्षण
पहली बार प्रेम में पड़ी स्त्री ने
अपने पाँवों तले की ज़मीन
धीरे से सरका दी।

वह खड़ी रही
देर तक…
पर भीतर नहीं गई
अभी
उसके हाथों
लिखी जानी थी
किसी और की मुक्ति।

और इस तरह,
हर बार
मोक्ष के द्वार से
ठीक पहले
स्त्री
जीवन में
लौट आती है।

मंगलवार, मार्च 24

मौन की तलछट

मौन की तलछट
✍️ अनीता सैनी
नेपथ्य की धूल
कविता की जड़ों में उतरती
वह नमी है,
जो मिट्टी की नसों में बहती है
और पत्तों की हरियाली में
अनकही
उग आती है।

कुएँ की अँधेरी देह में
जल की तरह
ठहर जाती है
जहाँ गिरती हुई आवाज़ें
अपने ही वज़न से
धीरे-धीरे
डूबती हैं,
मौन की तलछट में बदलती,
और फिर
किसी अनजानी प्यास की दरार से
फिर से
कविता की तरह
रिसने लगती हैं।

वह रेत पर चलती
हवा नहीं,
एक अदृश्य खिसकन है
जिसके गुजरते ही
समय का कोई टीला
अपनी जगह
छोड़ देता है।

वह तितली से पहले की
बंद देह है,
जिसे उँगलियाँ
रेशम समझकर छूती हैं,
और भीतर
धीरे-धीरे
गलती हुई उड़ान
किसी और आकाश की
तैयारी करती है।

शब्दों के बाहर की वह जगह
जहाँ चुप्पियाँ
अपने ही टूटे हुए किनारों को
समेटती हैं,
और अर्थ
नेपथ्य की धूल में
धीरे-धीरे
दब जाते हैं।

हर कवि
वहीं आता है
अपने सबसे गहरे सच के साथ,
उन्हें उजाले से बचाकर
उसी अँधेरी तहों में
रख देता है
जहाँ वह 
बिना कहे
सबसे अधिक
ठहरता है।