गूँगी गुड़िया

अनीता सैनी

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शुक्रवार, मई 22

श्रमजीवी श्रम धावक

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कुछ परछाइयाँ मायूस हुईं ! कुछ शीश टिकाए बैठीं घुटनों पर  कुछ बौराई-सी नम आँखों से  पथरीले पथ पर टहल रहीं।    घने अंधियारे में...
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अनीता सैनी
मैं एक ब्लॉगर हूँ, स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हूँ, प्रकृति के निकट स्वयं को पाकर रचनाएँ लिखती हूँ, कविता भाव जगाएँ तो सार्थक है, अन्यथा कविता अपना मर्म तलाशती है |
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