कुछ दौड़ कुछ होड़ हारने की पेपर पर स्याही उड़ेल गलाने की किसानों का निवाला छीनने की थी देह दर्द से टूटी थी आसमान की शब्दों में पीड़ा पनपी थी धरती के प्रसन्नचित जीवन अश्रुपूर्ण लिबास में अंतस अधीर बेचैनी झरता पात थी डर देहरी पर बिस्तर बिछाए बैठा था।
चौराहों की रौनक छीन ली गई
गलियों को उनकी हैसियत बताई
पत्थर पर पैर पल-पल जीवन को
मारने के लिए मजबूर किया गया
सफ़ेद चील ने तजरबा के कान छिदवाए
संस्कार कह रस्मों की माला पहनाई।
2020 का बर्बरतापूर्ण भयावह रुप
दीवारों को चुप्पी की चादर ओढ़ाई
निर्ममता की हदें ढहाता दिमाग़ का पानी
संतोष को निगलता छद्म की अगुवाई में था
क़दमों तले वर्तमान को कुचलता साहिर था।
इंसानों के कलेजे को काट तरक़्क़ी को
तनावमुक्त करने का वादा गढ़ा
विश्व व्यथित घुटन में देश का समीर
विकृति मानव के मस्तिष्क पर सवार
घटनाओं की नहीं यह वर्तमान की पीर थी।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'

