मग्न आज किस लय में बंधु।
तरुवर पथ की सूखी शाख़
नवीन किसलय मुरझाए बंधु।
असहाय की छलकती पीड़ा
पेट की भूख आँखों से टपकी।
संवेदनहीन पूंजीभूत पराग
अनल-सी जलती देह सारथी।
समझ पड़ाव सब भाप बने
कहाँ निशा पुण्य प्रभात बंधु।
शोभा श्री समन्वय जनगण से
करुणा की बरसा बौछार।
मजबूर मज़दूर पुर को दौड़े
माली थमा पुष्प का एक हार।
मणि-मनके खनि की शोहरत
भावुक मन जगा अनुराग बंधु।
अचरज से छलक उठी निगाहें
परिमलमय पारिजात पर।
इंगित अंतस के अश्रुकर
तरु-शाख़ा पर किसलय सूखे।
हृदय की पीड़ा फूटी सड़क पर
बदल न लिबास बारंबार बंधु।
©अनीता सैनी

