सुदूर दिश में दौड़ता अबोध छौना
बादल-सी भरता भोली कुलाँच।
तपती धूप ने किया है कोई फ़रेब या
उमसाए सन्नाटे ने लगाई है आँच।
मरुस्थल पर हवा ने बिखेरे हैं धोरे
काल की रेत पर मूर्छित हैं पदचाप।
गर्दन घुमा देखता बकरियों का समूह
गूँजता गड़रिये का व्याकुल आलाप।
आँधी से उड़ती धूल देख अचकचाए गर्दन घुमा देखता बकरियों का समूह
गूँजता गड़रिये का व्याकुल आलाप।
पीड़ा पी रहे बालू के महीन कण-कण।
बेबस पर यों हुक्म सब्र का बाँध न बना
वेदना के सैलाब में डूबा हुआ है जनगण।
बेबस पर यों हुक्म सब्र का बाँध न बना
वेदना के सैलाब में डूबा हुआ है जनगण।
संदेह के आत्मघाती तीर तरकश में छोड़
मृगमरीचका-सा भ्रम जाल न बना।
मृगमरीचका-सा भ्रम जाल न बना।
संयम संतोष सहेज राह में पल के पथिक
तरसती आँखों को यों बदरी न बना।
© अनीता सैनी
तरसती आँखों को यों बदरी न बना।
© अनीता सैनी

