गूँगी गुड़िया

अनीता सैनी

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गुरुवार, मई 21

काल की रेत पर मूर्छित हैं पदचाप

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सुदूर दिश में दौड़ता अबोध छौना बादल-सी भरता भोली कुलाँच।  तपती धूप ने किया है कोई फ़रेब या  उमसाए सन्नाटे ने लगाई है आँच।  मरुस्थल ...
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अनीता सैनी
मैं एक ब्लॉगर हूँ, स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हूँ, प्रकृति के निकट स्वयं को पाकर रचनाएँ लिखती हूँ, कविता भाव जगाएँ तो सार्थक है, अन्यथा कविता अपना मर्म तलाशती है |
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