अपनी ही मिट्टी में
✍️ अनीता सैनी
साँस लेने के लिए
छूट जाते हैं कुछ पत्ते पेड़ों से,
और कुछ पन्ने किताबों से।
वे तारीख़ नहीं बनते,
किसी पुराने फूल की गंध बन
बीते मौसमों की तहों में
चुपचाप पड़े रहते हैं।
नियति का चाक
उन्हें बार-बार नहीं गढ़ता।
धूप और बारिश का स्वाद लेकर
वे अपनी ही मिट्टी में
जंगली घास की तरह
फिर उग आते हैं।
तुम चाहो तो
उसके सपनों की आख़िरी लौ बुझा दो,
धोरे पर ठहरी पगडंडी मिटा दो,
और उसके होंठों के भीतर
रेत में दबा नाम भी।
पर उसका सब्र मत छीनना।
सब्र छिना हुआ बीज
अपनी छाँव ही नहीं खोता,
वह भीतर से सूख जाता है
और अंततः
पीपल नहीं,
बबूल हो जाता है।

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