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मंगलवार, अगस्त 18

आठवाँ पहर


आठवाँ पहर 
✍️अनीता सैनी 
......

कई सौ साल पहले
सदी का आख़िरी ग्रहण उतरा
सूरज के पाँव में
कालिख उतर आई
और एक पहर
समय से बाहर सूख गया।

उसके पाँव
पानी पर उतरे
और
लहरों की देह पर
काले अक्षर छोड़ गए।

दूधिया चाँदनी में नहाया
चाँद
कुएँ की जगत देखता रहा।

कुएँ ने
ख़ुद को नहीं उल्टा,
मटका
पानी बदलता रहा।

सारे पत्ते
ख़त हो गए थे
काग नहीं,
एक सफ़ेद कबूतर
छत पर उतरा।

और
एक थका हुआ दिन
रात में डूब गया।

उसकी देह
काली पड़ती रही।

और मैं
तुलसी पत्ते निगलती रही।

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