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रविवार, अप्रैल 26

प्रतीक्षा से परे


प्रतीक्षा से परे

✍️ अनीता सैनी


नदी के किनारे

बैठे रहना वर्षों तक 

प्रतीक्षा को साधना समझकर।


फिर एक दिन जाना

प्रतीक्षा

धीरे-धीरे धड़कनों को

पत्थर की चुप्पी में बदल देती है,

और करुणा

उसी पत्थर की दरारों से

फिर जल का रास्ता खोज लेती है।


विरह लिखा गया,

पीड़ा भी

और अंत में

एक सूखी पत्ती-सा लिख दिया गया

कि कुछ भी स्थायी नहीं होता।


न अपमान,

न प्रेम का आग्रह,

न ही वह आवाज़

जो दीवारों में गूँजकर

वापस लौट आती थी।


सब चुपचाप

समय की धारा में घुल जाता है

जैसे पगडंडी पर ठहरा पानी

धूप की पहली किरण में

बिना शोर सूख जाता है।


बस एक हल्की-सी नमी बचती है

चलते रहने की,

बिना पीछे देखे।


अब

कुछ नहीं किया जाता

न समझा जाता है,

न समझाया जाता है,

न माँगा जाता है,

न किसी को दोष दिया जाता है।

बस देखा जाता है

जैसे पेड़

ऋतुओं के आने-जाने को

अपनी जड़ों में दर्ज करते हैं,

जैसे नदी

किनारों को छूकर भी

उन्हें अपने साथ नहीं बाँधती।


भीतर अब

एक करुणा बहती है

निर्विकार, निरंतर

पत्थरों के लिए भी,

काँटों के लिए भी,

और उन हाथों के लिए भी

जिन्होंने छूकर

अपना कठोर होना सीखा था।


अब जाना गया है

दुनिया बाहर नहीं,

भीतर उगती है

मौन की मिट्टी में,

अनुभव की धूप में।


और वही भीतर का संसार

हर दिन

थोड़ा-थोड़ा परोसा जाता है

रोटी के साथ,

एक लंबी चुप्पी के साथ,

और उस मुस्कान के साथ

जिसमें अब कोई दावा नहीं,

कोई प्रतीक्षा नहीं

सिर्फ स्वीकृति की शांति है।


अब

डायरी में शब्द नहीं उतरते

बस

धीरे-धीरे

भीतर से बाहर

एक आकाश फैलता जाता है।


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