प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं,
✍️अनीता सैनी
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प्रतीक्षाएँ जब उम्र खाने लगती हैं,
तब संसार वैसा नहीं रहता
जैसा पहले था।
सुबह की धूप ही नहीं,
हवा के साथ चौखट तक चली आई मिट्टी भी
अपनी लगने लगती है।
दूर तक जाते रास्ते
ऐसे लगते हैं,
जैसे उसी से मिलने निकल पड़े हों।
खिड़की की सलाखें,
दरवाज़े की कुंडी,
साँझ की पहली छाया
सब धीरे-धीरे
किसी एक नाम से भरने लगते हैं।
बरसता पानी
मानो किसी दूर बैठे मन का ताप
बूँद-बूँद पिघलकर
धरती पर उतर रहा हो।
रात की हवा
जब धीरे से पर्दे को छू जाती है,
तो लगता है
किसी ने बिना आवाज़ दिए
अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
धीरे-धीरे प्रतीक्षा
दूब-सी धरती पर फैल जाती है।
वह पेड़ों में बस जाती है,
रास्तों में, ऋतुओं में,
यहाँ तक कि घर की दीवारों में भी।
और फिर
वह आत्मा का स्वभाव बन जाती है।
आशा की धीमी लौ बनकर
वह भीतर कहीं जलती रहती है,
जिसे मन
दोनों हथेलियों में सँभाले रहता है।
उसके लिए
घर का एक दरवाज़ा,
एक रास्ता,
एक दीपक
और मन का एक कोना
उजाले को बचाए रखता है।

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