अनकहा जल
✍️ अनीता सैनी
….
एक समय के बाद
देखने के लिए
अंधा हो जाना पड़ता है।
जल
अपनी पारदर्शिता में
तल नहीं देख पाता,
वैसे ही आँखें
दृश्य सँभालते-सँभालते
दृष्टि खो देती हैं।
गहराई में उतरने के लिए
चुपचाप बैठना पड़ता है
इतना चुप
कि भीतर गिरती
एक स्मृति की आवाज़ भी
अलग से सुनाई देने लगे।
पर वे अब भी कहते हैं-
बोलना आना ज़रूरी है।
कोई नहीं कहता
कि जीभ का हिलना
और शब्द का जन्म
दो अलग घटनाएँ हैं।
वर्षों से
मनुष्य अपने शब्द
कुओं में डालता रहा है
इतना
कि अब भूल गया है
जो प्रतिध्वनि लौटती है,
वह कुएँ की है
या उसी की अपनी
धीरे-धीरे पत्थराती आवाज़।
कभी लगता है
कुआँ ही मनुष्य को पुकार रहा है
अपनी गहराइयों में दबे
अनकहे जल की ओर…
और कभी लगता है
मनुष्य ही
अपने भीतर के सूखे को
वर्षों तक आवाज़ देता रहा,
पर हर बार
लौटकर वही सुनता रहा
जो उसने कभी कहा ही नहीं था।
शायद इसी तरह
एक दिन
शब्द
अपने कहने वाले से अलग हो जाते हैं
और फिर
कुएँ
मनुष्यों से अधिक
मनुष्य लगने लगते हैं।

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