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मंगलवार, फ़रवरी 6

पीड़ा

पीड़ा / कविता / अनीता सैनी

६फरवरी २०२४

……

उन दिनों

घना कुहासा हो या 

घनी काली रात 

वे मौन में छुपे शब्द पढ़ लेते थे

दिन का कोलाहल हो या

रात में झींगुरों का स्वर  

वे चुप्पी की पीड़ा

बड़ी सहजता से सुन लेते थे 

प्रेम की अनकही भाषा पर

गहरी पकड़ थी 

समाज के बाँधे बंधन

अछूते थे उसके लिए

यही कहा-

“तुम पुकारना, मैं लौट आऊँगा।”

परंतु जाते वक़्त सखी!

पुकारने की भाषा नहीं बताई।

शनिवार, जनवरी 27

सुनो तो

सुनो तो / अनीता सैनी

२६जनवरी २०२४

…..

देखो तो!

कविताएँ सलामत हैं?

मरुस्थल मौन है मुद्दोंतों से

अनमनी आँधी  

ताकती है दिशाएँ।


पूछो तो!

नागफनी ने सुनी हो हँसी

खेजड़ी ने दुलारा हो

बटोही

गुजरा हो इस राह से 

किसी ने सुने हों पदचाप।


सुनो तो ! 

जूड़े में जीवन नहीं

प्रतीक्षा बाँधी है

महीने नहीं! क्षण गिने हैं 

मछलियाँ साक्षी हैं 

चाँद! आत्मा में उतरा 

मरु में समंदर!

यों हीं नहीं मचलता है।

               

    

सोमवार, जनवरी 22

तुम्हारे पैरों के निशान

तुम्हारे पैरों के निशान / अनीता सैनी

२०जनवरी २०२४

…..

उसने कहा-

सिंधु की बहती धारा 

बहुत दिनों से बर्फ़ में तब्दील हो गई है

उसके ठहर जाने से 

विस्मय नहीं

सर्दियों में हर बार

बर्फ़ में तब्दील हो जम जाती है 

न जाने क्यों?

इस बार इसे देख! ज़िंदा होने का

भ्रम मिट गया है

दर्द की कमाई जागीर

अब संभाले नहीं संभलती 

पीड़ा से पर्वत पिघलने लगे हैं 

दृश्य देखा नहीं जाता  

दम घुटता है 

ऑक्सीजन की कमी है?

या

कविता समझ आने लगी हैं।

                      

शुक्रवार, जनवरी 12

नदी

नदी / अनीता सैनी ‘दीप्ति’
....

कई-कई बार, कि हर बार 
तू बह जाने से रह गई?
कुछ तो बोल! क्रम भावों का टूटा 
आरोह-अवरोह बिगड़ा भाषा का 
कि कविता सांसें सह गई?

कैसे सोई धड़कन?
दरख़्त के दरख़्त कट गए!
हरी लकड़ियाँ चूल्हे में रोई नहीं?
मरुस्थल हुई मानवता या 
ज्वार नथुनों से बहा नहीं ?
क्वाँर की बयार कह गई 
कैसे रही तू ज़िंदा?
कैसे जीवन सह गई?

महामौन बिखरा अंबर का 
कैसे लौटी हवा आँगन की?
भावना विचलित बादलों की
गरजती हुए कह गई- “कि एक नदी के
सूखने भर की देर थी?
 कि जो भाषा न समझे उन्हें
प्रतिकों की परिभाषा समझ आने लगी?

रविवार, दिसंबर 31

क्षणिकाएँ

1.

"मैं जल्द ही वापस आऊँगा।”
समय के साथ उसके पैर नहीं
यह वाक्य लड़खड़ाने लगा
तभी से मैं 
पुरुष शब्द का एक और अर्थ स्त्री पढ़ने लगी।

                                        अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                           २४मई २०२३

2.


तुम्हारी परछाई
मेरे जीवन की उँगली पकड़कर चलती है
वही उकेरती है भविष्य के कुछ चित्र
वर्तमान को पूर्णता का उपहार देती है
तब मैं दिन-रात को दिन-रात से पहचानती हूँ
प्रतीक्षारत की भाँति तारीख़ कहकर नहीं पुकारती।

                                       अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                           १९ मई २०२३

3.

हवा के साथ सरहद लांघ जाते हैं बादल
अब अगर कुछ दिनों में ये नहीं लौटे
तुम देखना! जेष्ठ कहर बरपाएगा 
बालू छाँव तकेंगी पौधे अंबर को  
मेरे दिन-रात तपेंगे तुम्हारे इंतज़ार में।
                                       अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                        २२ मई २०२३

4.

कभी-कभी
कोई वज़ह नहीं होती रूठने की 
फिर भी महीनों तक बातें नहीं होती
रास्ते भी जाने-पहचाने होते हैं
पीर पैरों की गहरी रही होगी 
कि वे उधर से गुजरते नहीं हैं ।
                               अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                  २८ मई २०२३

5.
निशीथ काल में
धरती उठी  
 कुछ अंबर झुका 
मौन में झरता समर्पण
चातक पक्षी ने गटका 
 फूल बरसाती हवा  
पशु-पक्षियों ने
 ध्यानमग्न हो सुना 
तब इंसान गहरी नींद में था।
                             अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                  ३१मई २०२३

6.

जिद्द नहीं साथ चलने की
पर किसी को इतना दूर भी
नहीं चलना चाहिए 
कि जब...
पीछे पलट कर देखें
सिवाय सुनसान रास्तों के कुछ न दिखे।
                                     अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                        २९मई २०२३

7.

किसी भी गाँव की लड़की को
काँटे नहीं चुभते
पगडंडियाँ
पाँव का स्पर्श पहचानती हैं
अब वे कहतीं हैं 
”बुहारे गए 
सभी काँटे मेरे पाँव में हैं।”
                            अनीता सैनी 'दीप्ति'
                             ९जून २०२३

8.
स्वेच्छाचारिता के फूटते 
अंकुर से 
सहजता सरलता के वृक्ष
 दम तोड़ देते हैं
या दबा दिए जाते हैं आवरण के नीचे 
जैसे दबा दी जाती हैं
घर के किसी कोने में बेटियाँ।
                         अनीता सैनी 'दीप्ति'
                          २३जुलाई २०२३
9.


अक्सर...
तुम्हारी देर से आने की आदत रही 
और मेरी तुम्हारा इंतजार में जागने की
दोनों की सादगी ने मिलकर
मेरे दिन-रात इकहरे कर दिया।
                        अनीता सैनी 'दीप्ति'
                          १९जुलाई २०२३
10.
ठीक कहा!
यह कहना कितना कठिन होता है
दुपहरी के लिए
जब वह
तप रही होती है सूरज के ताप से।
                                   अनीता सैनी 'दीप्ति'
                                     १८जुलाई २०२३


शब्द


शब्द /अनीता सैनी ‘दीप्ति’

….

हवा-पानी 

और प्रकाश की तरह

शब्दों की भी 

सरहदें नहीं होती,

शब्द 

दौड़ते हैं

ध्वनि वेग से

मूक-अमूक भावों के 

स्पर्श हेतु

संवेदनाओं का नाद

गहरा प्रभाव छोड़ता है

हृदय पर

क्योंकि शब्द 

हृदय की उपज है

मुख की नहीं।

शनिवार, दिसंबर 9

उसकी चेतना


उसकी चेतना / अनीता सैनी ‘दीप्ति’
…
उसकी चेतना 
मेरे अवचेतन में
है, बिछी 
सांसों की नमी से अँकुराती 
भावों की
धूप से पुष्पित-पल्लवित
अबुझे
फूल-सी हृदय में है,छिपी
अंतस में कुलबुलाती
मौन है,मंढे
मरु कणिका चंचला चंद्र प्रिया 
है,अति व्यग्र
नित नई उपमाएँ लिए कविता
है,गढ़े।

शुक्रवार, दिसंबर 1

शिव


शिव / अनीता सैनी ‘ दीप्ति’

….

टूटकर

बिखरी सांसें 

भाव

मोतियों से चमक उठे 

महावर सजे पैर

भोर!

दुल्हन बन उतरी थी

धरती पर।


उस दिन 

समर्पण के सागर में

 तिर रहा था उज्जैन 

भस्म

बादलों से बरसी

मन के एक कोने में उगा 

सूरज

मन मोह रहे थे

 महादेव 

गर्भगृह की चौखट पर बैठी

 मैं 

एक-टक निहार रही थी कि 

हृदय की रिक्तता ने  तोड़ा बाँध 

पलकें भीग गईं 

तब उसने कहा-

“काशी में मिलेंगे तुम्हें

शिव, कबीर

 तुम समर्पण लेते हुए जाना।”

रविवार, नवंबर 26

पूर्व-स्मृति


पूर्व-स्मृतियाँ / अनीता सैनी ’दीप्ति’

…

 उन दिनों प्रेम को केवल

 कैवल्य की पुकार सुनाई देती थी 

उसके पास

एकनिष्ठता के परकोटे में अकेलापन था

एकांत नहीं!


मिट्टी के टीलों के उस पार

उदास साँझ को विदा करता 

वह सोचता कि

प्रतीक्षा-गीत गाते-गाते क्यों रूँध जाता है

साँझ का भी कंठ?


बर्फ़ का फोहा

 फफकती सांसों पर रखता 

स्वयं के चुकते जाने को खुरचता 

मन की शिला पर भावों के जूट को कूटकर 

समय की मशाल में जलावण भरता 

ढलती उम्र के निशान

 देह पर  दौड़ जाते सर्प से।


चिट्ठी में

प्रियतम को मरुस्थल की तपती रेत लिखता 

 प्रियतम हिमालय की कुँआरी हिम

दायित्व-बोध पृथ्वी की धुरी-सा घूमता 

वहीं खो गए दोनों के जीवन पद-चिह्न

एक के हिमालय की बर्फ में

दूसरे के मरुस्थल की रेत में।