उसकी चेतना / अनीता सैनी ‘दीप्ति’
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उसकी चेतना
मेरे अवचेतन में
है, बिछी
सांसों की नमी से अँकुराती
भावों की
धूप से पुष्पित-पल्लवित
अबुझे
फूल-सी हृदय में है,छिपी
अंतस में कुलबुलाती
मौन है,मंढे
मरु कणिका चंचला चंद्र प्रिया
है,अति व्यग्र
नित नई उपमाएँ लिए कविता
है,गढ़े।
