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शनिवार, दिसंबर 9

उसकी चेतना


उसकी चेतना / अनीता सैनी ‘दीप्ति’
…
उसकी चेतना 
मेरे अवचेतन में
है, बिछी 
सांसों की नमी से अँकुराती 
भावों की
धूप से पुष्पित-पल्लवित
अबुझे
फूल-सी हृदय में है,छिपी
अंतस में कुलबुलाती
मौन है,मंढे
मरु कणिका चंचला चंद्र प्रिया 
है,अति व्यग्र
नित नई उपमाएँ लिए कविता
है,गढ़े।