स्नेह धार बरसा देना तुम,
प्रीत पौध पर पुष्प खिलेंगे,
धरा चीर सरसा देना तुम।
जीवन रहस्य सागर गहरा,
संदेश पवन को लिख छोड़ा
पर्वत पीड़ा मैं लिख दूँगी,
संताप हरण क्यों मुख मोड़ा,
सोये मानुष उठ जाएँगे,
मनुज धर्म दरसा देना तुम।
प्रसून धरा है वादियों की,
द्वेषित मानस पर धर देना,
प्रहरी पीड़ा क्षण भर की है,
पत्र प्रेम रस से भर देना,
मंजुल,मधुर चहक पाखी की,
मीठी धुन उरसा देना तुम।
भाव समय सुंदर पटलक पर,
करुणा की सरगम बिखरेगी
रीतियों-नीतियों में बँधकर,
ममता मानव की निखरेगी,
पंछी भर भर जल लाऐगे,
पात प्रीत हरसा देना तुम।
@ अनीता सैनी 'दीप्ति '

