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गुरुवार, सितंबर 1

स्वेटर



” औरत हो! कभी अपने हृदय में झाँककर

अपने अंदर की औरत से भी मिल लिया करो 

पूछ लिया करो! दुख-दर्द उसके भी।”


कहते हुए-

उसांस के साथ हाथ बढ़ाएँ 

 और सीने से लगा लिया।


कुछ समय पश्चात चुपचाप उठकर चला गया।

कहते हुए-

”ख़याल रखना, जल्दी मिलते हैं।”


वह नहीं बोलता कभी

आँखें ही बोलती हैं उसकी

 एक छोर भी न पकड़ा और 

वर्षों से बुना

शिकायतों का स्वेटर एक पल में उधेड़ गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'