” औरत हो! कभी अपने हृदय में झाँककर
अपने अंदर की औरत से भी मिल लिया करो
पूछ लिया करो! दुख-दर्द उसके भी।”
कहते हुए-
उसांस के साथ हाथ बढ़ाएँ
और सीने से लगा लिया।
कुछ समय पश्चात चुपचाप उठकर चला गया।
कहते हुए-
”ख़याल रखना, जल्दी मिलते हैं।”
वह नहीं बोलता कभी
आँखें ही बोलती हैं उसकी
एक छोर भी न पकड़ा और
वर्षों से बुना
शिकायतों का स्वेटर एक पल में उधेड़ गया।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'

