स्नेह की लालिमा,
फैली यूँ धरा पर दूर तलक,
मख़मली कोमल एहसासों में,
लिपटा ज़मीं से नील-फ़लक |
तरु की साख झुकी भूतल पर,
पाने धरा का निर्मल स्पर्श,
हर्ष में डूबा खिलखिला रहा मन,
उठी लहर सागर में,प्रीत की रही वो झलक|
आशा-अभिलाषा संग कमनीय,
मृदुल प्रमोद में चमक रही हृदय की लालसा,
पिया संग गाये मधुर रागिनी, बैठ साँझ सिरहाने,
मादकता में डूबा क्षितिज निहारे धरा को अपलक |
- अनीता सैनी

