सुनो प्रिये !
तुम यों ही मुस्कुराते रहना
बन्धुत्त्व का गान
गुनगुनाते रहना तुम अहर्निश
मिटाना न मन की सादगी
चमन में बहार बन खिलखिलाते रहना
चमन में बहार बन खिलखिलाते रहना
प्रेम दीप हृदय में
ढलती साँझ तुम यों ही जलाते रहना,
जला
जीवन में ज्योति प्रीत की
मैं अंतिम
साँस तक धधकूँगी
निर्वहन
करुँगी दायित्व तुम्हारे
कुंठित समाज की कुंठा सहूँगी
शब्द-बाण से न आहत
अपने मन को करुँगी
अडिग रहूँगी
अडिग रहूँगी
ताड़ के पेड़-सी
वह स्वाभिमान है मेरा
तुम
ग़ुरुर का ग़ुबार न समझना,
सुनो प्रिये !
तुम समझ से न समझाना
बुद्धि को अपनी
तुम नासमझ रहना
बदल रही है हवा देश की
तुम सीने पर
फ़सल राजनीति की
न लहराना,
जब याद
सताये अपनों की
तुम वही
प्रीत पहन लौट आना
खटकाना चौखट
ख़ामोशी से
हड़बड़ाहट न दहलीज़ पर दर्शाना
खोयी हैं फ़ज़ाएँ स्वप्न में
निशा को नींद से तुम न जगाना,
सुनो प्रिये !
तुम विचलित मन न करना
जल रहा है
द्वेष में हृदय जनमानस का
रोष टपक रहा है आँखों से
पड़े है ज़ुबा पर
छाले तमाम ख़्वाहिशों के
तुम प्रीत की बातें न करना
ढो न पाओगे स्वार्थ का लवादा
सुनो प्रिये !
तुम ख़ुद से ख़ुद की बातें करना |
©अनीता सैनी

