कुछ पल का बने सहारा है,
निर्मल नीर चाँद की छाया,
ऐसा सुख स्वप्न हमारा है।
समय सरित बन के बह जाता,
रहस्यमयी लहरों में कौन,
शून्यकाल की सीमा बैठा,
नीरव पुलिन मर्मान्तक मौन।
गहन निशा में जुगनू आभा,
थाह तम साथी सहारा है,
निर्मल नीर चाँद की छाया,
ऐसा सुख स्वप्न हमारा है।
धुंध की धूमिल आभा में,
बांधे बँधन प्रेम विश्वास ,
सहृदय दीप वर्ति साँसों में,
प्रीत ज्योति की अमर है आस।
तरणि तट मिट्टी के घरौंदे,
सजन बस तेरा सहारा है,
निर्मल नीर चाँद की छाया,
ऐसा सुख स्वप्न हमारा है।
©अनीता सैनी
©अनीता सैनी

