इस की यही कहानी,
सिसक रहा हृदय,
नहीं मिटती बेईमानी |
सृजन बीच छिपी पीड़ा,
होठों से कैसे मुस्काऊँ,
रुंधे कंठ बुझे मन के,
कैसे आवाज़ लगाऊँ |
झर रहे प्रीत फूल धरा के,
कैसी हुई बौछार गगन से,
मादकता में फिर उलझ गये,
हार गए चंचल चितवन से |
तपन मरु के सिसके छाले,
चितादीप-सा जलता जीवन,
हृदय में धधक रही ज्वाला,
समय धार पर चलता जीवन |
छूट रहीं साँसें तन की,
क़ीमत जीवन की तब समझे,
जब तक रहे इस दुनिया में,
रहे मोह माया में उलझे |
- अनीता सैनी
