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शनिवार, मार्च 30

समय धार पर चलता जीवन



   
                                                                                                                             
मोह  माया  में फंसा  जीवन, 
इस    की    यही   कहानी, 
सिसक   रहा    हृदय, 
नहीं    मिटती     बेईमानी |

सृजन  बीच  छिपी  पीड़ा, 
होठों   से   कैसे  मुस्काऊँ,  
रुंधे    कंठ   बुझे   मन के, 
कैसे    आवाज़     लगाऊँ |

झर  रहे  प्रीत  फूल  धरा  के,  
कैसी  हुई  बौछार  गगन से, 
मादकता में फिर उलझ गये,  
हार  गए  चंचल   चितवन  से |

तपन  मरु   के  सिसके  छाले, 
चितादीप-सा  जलता  जीवन, 
  हृदय   में   धधक   रही  ज्वाला, 
समय  धार  पर  चलता   जीवन |

छूट   रहीं    साँसें    तन की, 
क़ीमत जीवन की तब समझे, 
जब   तक  रहे  इस   दुनिया में, 
रहे   मोह   माया   में   उलझे |

- अनीता सैनी