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बुधवार, मई 6

संजीदगी संग प्रश्न


तहजीब के मन्वंतर में,
भ्राँतिक अभिनय जग का खेल,   
अंधेरे में बंद ज़िंदगियाँ है,  
 समय-दीपक में नहीं है तेल। 

दबे पैरों की आहट थी  वो,  
रहस्य की ध्वनि है  मौन,  
भविष्य के गर्भ में छिपे चेहरे,  
वे तिलिस्मी लुटेरे कौन? 

निस्तब्ध मटमैले जलाशय  में,
अनचीह्नी झाँकती है आकृति,
ललाट पर बिखरी सलवटें,
नुकीले दाँत,अहं-दंश की है आवृत्ति।

हल्की काली पट्टी नैनों पर,
अवचेतन का है सारा खेल,
शून्य बिंदु-सा है गलियारा,
सत्य रथ की बुझी है मशाल।

संजीदगी संग प्रश्न अनुत्तरित,
रिसते निरंकुशता के गहरे घाव, 
उन्मुख अंबर को है ताकता,  
दीप्ति-दृग,सौम्य मुख प्रादुर्भाव।


©अनीता सैनी 'दीप्ति'