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शुक्रवार, दिसंबर 6

शलभ-सी प्रीत



 चंद्रभानु को विभास का मूल्य बता, 
 तिमिर को राह दिखा रहे, 
खारे मोतियों को थामे अँजुरी में, 
परोपकार का हार पिरो रहे |

ज़माने का जतन नहीं, 
कांस के खिले फूल फुसफुसा रहे, 
मिलेंगे कँबल दान में, 
इस बार ठंड को वे यों समझा रहे |

शलभ-सी प्रीत पिरोये हृदय में, 
  ऊँघती तड़प कलिकाल में मुस्कुरायी,  
उम्मीद नयनों में ठहर,चराग़ जलेंगे, 
पवन से यों  गुस्ताख़ियाँ जता रहे |

नदी के तटबंध अधीर मन से सुगबुगाये, 
बदली जो राह उसी राह पर थर्राये,  
शायद उद्गम मेरा मोड़ने अब,  
 नये ठेकेदार धीर मन से आ रहे |

चीरती हवा पीड़ा और पराजय को  , 
मिथ्या-तृप्ति,भटकन समेटे समय को कचोटती रही, 
बियाबान में ठंड के थपेड़ो से, 
ठिठुरते कांस अस्तित्त्व अपना जता रहे |

©अनीता सैनी