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सोमवार, अप्रैल 20

विचलित है जर्जर बूढ़ा नीम



 ढो रहा है उम्र को ढलते पडाव पर,
विश्व-पटल पर बदलते हालात पर,
ज़िंदगी के दिये अप्रत्याशित अनुभव पर, 
 आकलन की भयावह तस्वीर पर, 
विचलित है जर्जर बूढ़ा नीम, 
   उम्र के ढलते पडाव पर। 

परस्पर अकारण हो रही मुठभेड़ से,
महामारी के वक़्त हो रही राजनीति से, 
पुलिस पर हो रहे पथराव से, 
डॉक्टरों-नर्सों की शहादत से, 
 छोड़ रहा है जड़े जर्जर बूढ़ा नीम, 
उम्र के ढलते पडाव पर।  

अमेरिका इटली की दयनीय हालत पर,
अपने ही देशवासियों की नासमझी पर,
आरोप-प्रत्यारोप के इस क्रूर संग्राम पर,
ऐसे वक़्त पैसे बटोरती परछाइयों पर,  
अस्तित्त्व दरकिनार किए जाने पर,
 बहा रहा है अश्रु जर्जर बूढ़ा नीम, 
 उम्र के ढलते पडाव पर।   

नीम की गुणवत्ता न समझ पाने पर, 
अपने आप पर होते सीधे प्रहार पर, 
कोरोना-काल में अपनों की बेरुख़ी पर, 
रुक-रुककर चलती हवा में सांसों पर, 
ता-उम्र लुटाई ज़िंदगी से कुछ प्रेम के , 
  माँग रहा है मीठे बोल जर्जर बूढ़ा नीम, 
उम्र के ढलते पडाव पर।   

©अनीता सैनी