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शनिवार, अगस्त 14

लू



 तपती बालुका पर दौड़ती लू

फफोलों को पाँव से हटाती है

पदचाप धोरे दामन से मिटाती

सूरज बादलों से ढकती है।


मरुस्थल के मौन को तोड़ती 

 कहानियों के पन्ने झोंके संग पलटती है

पीठ पर लादे गोबर के कंडे 

हिय के संताप से झुलसाती है।


कोई  टीस उठी होगी हृदय में 

पलकों को खारे पानी से धोती है

सूखे पत्तों-सी झरती साँसें उठाए

धूप में गगरी उम्मीद की भरने निकलती है।


अश्रुभार गले में मुक्ताहार 

 स्वछंदता की ओढ़नी ओढ़ा करती है

वर्तमान की पूरती चौकी आटे से

सकारात्मकता का पाठ पढ़ाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'