बहुत ही बीमार,
तुम्हारी धमनियों से,
रिस रहा था डाह।
अज्ञानी थे,
या खड़ा था साथ,
तुम्हारे अहंकार,
जब कर रहे थे तुम,
द्वेष की जुगाली,
सीख-समझाइश पर,
अहर्निश कर रहे थे,
रह-रह कर रुदाली।
सीख-समझाइश पर,
अहर्निश कर रहे थे,
रह-रह कर रुदाली।
शारीरिक रुप से,
नहीं थे तुम बीमार,
उस वक़्त तुम अपनी ही,
मानसिकता की थे,
गिरफ़्त में,
गिरफ़्त में,
चारों तरफ़ मच रहा था,
मौत का कोहराम,
और तुम थूक रहे थे,
अपनी अस्मत पर,
गली-मोहल्ले और घरों पर,
या स्वयं के विवेक पर।
©अनीता सैनी 'दीप्ति'
©अनीता सैनी 'दीप्ति'

