पाखी मन व्याकुल है साथी
खोई-खोई मौन प्रभाती।
भोर धूप की चुनरी ओढ़े
विकल रश्मियाँ लिखती पाती।।
मसि छिटकी ज्यूँ मेघ हाथ से
पूछ रहे हैं शब्द कुशलता
नूतन कलियाँ खिले आस-सी
मीत तरु संग साथ विचरता
सुषमा ओट छिपी अवगुंठन
गगरी भर मधु रस बरसाती।।
पटल याद के सजते बूटे
छींट प्रीत छिटकाती उजले
रंग कसूमल बिखरी सुधियाँ
पीर तूलिका उर से फिसले
स्वप्न नयन में नित-नित भरती
रात चाँद की जलती बाती।।
शीतल झोंका ले पुरवाई
उलझे-उलझे से भाव खड़े
कुसुम पात सजते मन मुक्ता
भावों के गहने रतन जड़े
भीगी पलकें पथ निहारे
अँजुरी तारों से भर जाती।।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'

