शुभ्र-लालिमा को लपेटे देह से,
भटकते दिन का ढलता पहर,
महताब संग बढ़ते पदचाप,
देख जीवन में हर्षायी साँझ।
मेहंदी के मोहक उठाये पात ,
पुलकित हृदय से इठलायी,
हर्षित फ़ज़ा से झूमी साँझ।
कमल-पँखुड़ियों से कोमल,
प्रीत रंग के महावर में डूबे पाँव,
दहलीज़ पर उतर हुई उल्लासित,
नयन अश्रु से धो मुस्कुरायी साँझ।
©अनीता सैनी
भटकते दिन का ढलता पहर,
महताब संग बढ़ते पदचाप,
देख जीवन में हर्षायी साँझ।
शरद चाँदनी से उजले हाथों में,
मेहंदी के मोहक उठाये पात ,
पुलकित हृदय से इठलायी,
हर्षित फ़ज़ा से झूमी साँझ।
कमल-पँखुड़ियों से कोमल,
प्रीत रंग के महावर में डूबे पाँव,
दहलीज़ पर उतर हुई उल्लासित,
नयन अश्रु से धो मुस्कुरायी साँझ।
©अनीता सैनी


