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सोमवार, सितंबर 21

मर्तबान


मर्तबान को सहेज रखती थी रसोई में 
मख़मली यादें इकट्ठा करती थी उसमें मैं 
जब भी ढक्कन हटाकर मिलती उन  से 
उसी पल से जुड़ जाती अतीत के लम्हों से 
चिल्लर जैसे खनकतीं थीं वे यादें दिल में 
एक जाने-पहचाने एहसास के साथ  
उसे छूने पर माँ के हाथों का स्पर्श
 महकने लगता अंतरमन के कोने में 
जब कभी भी वह  हाथ से फिसलता 
डर मुट्ठी में समा हृदय में उतर जाता  
कहीं टूट न जाए ,छूट न जाए 
फिसल न जाए हाथ से मेरे 
माँ का साथ आशीर्वाद समझ 
अनजाने में उससे बातें करने लगी 
गंभीर मुद्रा में वह मेरी बात सुनता 
कभी-कभी माँ का चेहरा उभर आता उसमें 
आज मेरे हाथ से टूट बिखर गया मर्तबान ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'