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मंगलवार, अक्टूबर 6

मनोज्ञ रश्मियाँ


मनोज्ञ रश्मियाँ 
समेटने लगी हैं स्वयं को 
भू पर बिखरे 
अतिशयोक्तिपूर्ण आभामंडल से 
विरक्त हो 
ज़िंदगी की दरारें 
वक़्त बे वक़्त चाहती हैं भरना  
जीवन की ऊहापोह से थक 
आज ख़ामोश हैं  
संकुचाई-सी मुरझाई-सी 
दायित्वबोध का करती भान 
कहती हम पाहुन हैं  
  निशा की गोद में सिमटी-सी 
सांसों में  ढूँढ़ती हैं सुकून 
यायावर रुप में ढला जीवन  
क़दमों का चाहती हैं ठहराव
अनमने मन से  हैं  उदास  
सुबह से शाम तक स्वयं में उलझी
यामिनी से मिलने पर भी  
समेटे शब्दों को मौन में 
चिंताग्रस्त स्वयं से क्रुद्ध 
समय पैंतरों से अनजान 
दुखांत हृदय को थामे पलकों से 
पूछती कौन हैं हम ?

@अनीता सैनी  'दीप्ति'