मनवार करे मनड़ो ढोला
कद मनावा रुठ्या मीत।
गुड़-शक्कर रो घोळ घौलियो
मिठे जल स्यूँ सींची प्रीत।।
बेल बूंटा बढ्या घणेरा
अंगना मंजरी फूले
प्रीत बादली छींटा छलके
झड़ी झूमती झुल्या झूले
सूना ढोला आज मालियो
राचे काजल कुंप गीत।।
गोटा-पत्ती ओढ़ लहरियो
पछुआ झांझरी झंकाव
गाँव-गलियाँ घूम अडाइयाँ
पाखी पुन मुग्ध लहराव
धुन छेड़ मन भावन गडरियो
पल्लू पगला उलझ रीत।।
धरती गोदां सोवे सुपणो
अंग-अंग अनंग उमड़े
सांझ लालड़ी उजलो मुखड़ो
अंबर आँचल आस जड़े
फूला में पद छाप निहारूं
प्रेम हृदय पावन पुनीत।।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'
शब्द-अर्थ
अडाइयाँ-मैदानी भूमि
मालियाँ= घर के ऊपरी भाग का मुख्य कक्ष
ढोला-प्रिय
मनवार - स्वागत करना
घणेरा-बहुत सारे
लहरियों-मिश्रित रंगों का प्रिंट जो दुपट्टे, साड़ी और ओढ़नी में होता है
गोदां -गोद में
सुपणो- स्वप्न

