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रविवार, जनवरी 10

बिछोह


बड़े दिनों बाद आवाज़ लगाई 
सूखे पत्तों से सजे आँगन ने
बाहें फैलाए  स्मृतियाँ 
स्वागत में प्रीत दीप जलाए 
वात्सल्य वीरानियों में
दहलीज़ पर सीलन अपनेपन की 
दीवारों की दरारों से झाँकता स्नेह
मन की आवाज़ में मैं बह चली
घर के सामने गली के नुकड़ पर
छोटा-सा नीम का पेड़ अब 
बड़ा हो अँग्रेज़ी बोलने लगा
विशाल टहनियाँ मुस्कुराती
कुछ कहकर लहराने लगतीं  
मैं उसकी यादों को छिपाती
दिखावे की व्यस्तता से
फुटकर हँसी सम्पन्नता के शृंगार से 
मन के दरीचों पर
आवरण करती यवनिका से
कि मन पटल पर बिछोह उभर न आए
फिर आज मन की आवाज़ में बह चली मैं?

@अनीता सैनी 'दीप्ति'