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सोमवार, अक्टूबर 21

बदल रही थी रुख़ आब-ओ-हवा ज़माने की




आहत हुए कुछ अल्फ़ाज़ ज़माने की आब-ओ-हवा में,  
लिपटते रहे  हाथों  से  और  दिल  में उतर गये, 
उनमें में एक लफ़्ज़ था मुहब्बत, 
ज़ालिम ज़माना उसका साथ छोड़ गया, 
  मुक़द्दर से झगड़ता रहा ता-उम्र वह, 
 मक़ाम उसका बदल दिया, 
इंसान ने इंसानियत का छोड़ा लिबास, 
 हैवानियत का जामा पहनता गया |

अल्फ़ाज़ के पनीले पुनीत पात पर, 
एक और लफ़्ज़  बैठा था नाम था  वफ़ा, 
तृष्णा ने  किया उसको तार-तार, 
अब अस्तित्त्व उसका डोल गया, 
कभी फुसफुसाता था उर के साथ ,   
लुप्त हुआ दिल-ओ-जिगर इंसान का, 
  मर्म वफ़ाई का जहां में तलाशता रह गया |

अल्फ़ाज़ के अलबेलेपन में छिपा था, 
एक और लफ़्ज़ नाम था जुदाई,  
एहसासात की ज़ंजीरों में जकड़ा, 
बे-पर्दा-सा जग में बिखरता  गया,  
बदल रही थी रुख़, 
आब-ओ-हवा ज़माने की, 
क्रोध नागफनी-सा, 
मानव चित्त पर पनपता गया |

 अल्फ़ाज़  से बिछड़ एक कोने में छिपा बैठा था,   

एक और लफ़्ज़ नाम था आँसू, 
शबनम-सा लुढ़कता था कभी ,  
दिल की गहराइयों में रहता था गुम, 
ख़ौफ़-ए-जफ़ा से इतना हुआ ख़फ़ा, 
आँखों से ढलकना भूल गया |

© अनीता सैनी