लिपटते रहे हाथों से और दिल में उतर गये,
उनमें में एक लफ़्ज़ था मुहब्बत,
ज़ालिम ज़माना उसका साथ छोड़ गया,
मुक़द्दर से झगड़ता रहा ता-उम्र वह,
मक़ाम उसका बदल दिया,
इंसान ने इंसानियत का छोड़ा लिबास,
हैवानियत का जामा पहनता गया |
अल्फ़ाज़ के पनीले पुनीत पात पर,
एक और लफ़्ज़ बैठा था नाम था वफ़ा,
तृष्णा ने किया उसको तार-तार,
अब अस्तित्त्व उसका डोल गया,
कभी फुसफुसाता था उर के साथ ,
लुप्त हुआ दिल-ओ-जिगर इंसान का,
मर्म वफ़ाई का जहां में तलाशता रह गया |
अल्फ़ाज़ के अलबेलेपन में छिपा था,
एक और लफ़्ज़ नाम था जुदाई,
एहसासात की ज़ंजीरों में जकड़ा,
बे-पर्दा-सा जग में बिखरता गया,
बदल रही थी रुख़,
आब-ओ-हवा ज़माने की,
क्रोध नागफनी-सा,
मानव चित्त पर पनपता गया |
अल्फ़ाज़ से बिछड़ एक कोने में छिपा बैठा था,
एक और लफ़्ज़ नाम था आँसू,
शबनम-सा लुढ़कता था कभी ,
दिल की गहराइयों में रहता था गुम,
ख़ौफ़-ए-जफ़ा से इतना हुआ ख़फ़ा,
आँखों से ढलकना भूल गया |
© अनीता सैनी
एक और लफ़्ज़ नाम था जुदाई,
एहसासात की ज़ंजीरों में जकड़ा,
बे-पर्दा-सा जग में बिखरता गया,
बदल रही थी रुख़,
आब-ओ-हवा ज़माने की,
क्रोध नागफनी-सा,
मानव चित्त पर पनपता गया |
अल्फ़ाज़ से बिछड़ एक कोने में छिपा बैठा था,
एक और लफ़्ज़ नाम था आँसू,
शबनम-सा लुढ़कता था कभी ,
दिल की गहराइयों में रहता था गुम,
ख़ौफ़-ए-जफ़ा से इतना हुआ ख़फ़ा,
आँखों से ढलकना भूल गया |
© अनीता सैनी

