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गुरुवार, सितंबर 26

पूँजीवाद का बीजारोपण राष्ट्रहित में है ?




वे मर रहें हैं, 
अपनी ही लाचारी से, 
प्रतिदिन लाखों की तादाद में, 
 कहीं कोई नामोनिशान नहीं !
कुछ मारे भी जाते हैं,  
बेबसी के हाथों, 
 रुतबे की निगाहों से, 
शब्दभेदी-बाण से, 
किन्तु कहीं ख़ून के धब्बे नहीं !
सभ्यता माँगती है, 
त्याग व क़ुर्बानी परिवर्तन के लिये, 
मैंने अपने आप से कहा |

 तुम जानती हो !
 पूँजीवाद का बीजारोपण
राष्ट्रहित में  है ? 
ज्ञानीजनों की है यही ललकार |
धनकुबेर जताते हैं, 
अपने आप को बरगद, 
उसकी छाँव में, 
पनपता है, 
 शोषण का चिरकालीन चक्रव्यूह, 
वे जताते हैं कि वे देते हैं पोषण,  
  कुपोषित पौध को, 
  कमजोर-वर्ग-मध्यम-वर्ग को, 
यही वृक्ष प्रदान करता है ख़ुराक़, 
किसी भले मानस ने कहा था मुझे,  
मैंने फिर अपने आपसे कहा |

हम स्वतंत्र हैं !
क्या यह जनतंत्र है ?
अधीन है, 
 एक विचारधारा के, 
 कुंठा के कसैलेपन का कोहराम मचा है, 
 अंतःस्थ में, 
कुपोषित हो गये, 
 हमारे आचार-विचार,संवेदनाएँ-सरोकार, 
अमरबेल-सा गूँथा है हवा में जाल, 
 नमी,पोषक तत्त्व का नित्य करते हैं, 
वे सेवन, 
   देखो ! पालनकर्ता हुए न वे हमारे, 
और मैंने फिर अपने आप से कहा !

© अनीता सैनी