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रविवार, दिसंबर 29

तुहिन-कण की अकुलाहट




 ओस की बूँदों ने अपनी असमंजसता, 
सस्नेह सजल भोर को सुनायी,  
रजत-कण के व्याकुल हृदय में कहाँ से,  
अवाँछित ज्वाला सुलग आयी ? 

जुगनू-सी चमकती थी चतुर्दिश,  
प्रीत की उज्ज्वल हीरों-सी कनियाँ,  
घास के घरोंदों पर रहती थीं बिखरीं,  
शबनम की मोतियों-सी लड़ियाँ |

निशा के अंतिम पहर की पाहुन बन,  
कभी नभ के तारों-सी जगमगायी, 
फूल-पत्तों की अँजुरी में विराजित, 
उपवन की शोभा सूर्याभा देख अकुलायी | 

वृक्ष की टहनियों से झाँकती पल-पल, 
प्रयत्नशील प्रभात के प्रथम पहर में मुस्कुरायी,  
तुहिन-कण की बूँदें मेरी हथेली में समा, 
सहर्ष स्वाभिमान से सृष्टि में यों हर्षायी |

©अनीता सैनी