ओस की बूँदों ने अपनी असमंजसता,
सस्नेह सजल भोर को सुनायी,
रजत-कण के व्याकुल हृदय में कहाँ से,
अवाँछित ज्वाला सुलग आयी ?
जुगनू-सी चमकती थी चतुर्दिश,
प्रीत की उज्ज्वल हीरों-सी कनियाँ,
घास के घरोंदों पर रहती थीं बिखरीं,
शबनम की मोतियों-सी लड़ियाँ |
निशा के अंतिम पहर की पाहुन बन,
कभी नभ के तारों-सी जगमगायी,
फूल-पत्तों की अँजुरी में विराजित,
उपवन की शोभा सूर्याभा देख अकुलायी |
उपवन की शोभा सूर्याभा देख अकुलायी |
वृक्ष की टहनियों से झाँकती पल-पल,
प्रयत्नशील प्रभात के प्रथम पहर में मुस्कुरायी,
तुहिन-कण की बूँदें मेरी हथेली में समा,
सहर्ष स्वाभिमान से सृष्टि में यों हर्षायी |
©अनीता सैनी
सहर्ष स्वाभिमान से सृष्टि में यों हर्षायी |
©अनीता सैनी

