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मंगलवार, मार्च 17

ढलती साँझ... नवगीत



ढलती साँझ मुस्कुरायी, 
थामे कुँजों की डार, 
थका पथिक लौटा द्वारे,  
 गूँजे दिशा मल्हार।  

पाखी प्रणय प्रीत राही,  
शीतल पवन के साथ, 
मुग्ध लय में झूमा अंबर,  
थामे निशा का हाथ,  
चंचल लहर चातकी-सी,  
दौड़ी भानु के द्वार, 
ढलती साँझ मुस्कुरायी,  
थामे कुँजों की डार। 

पूछ रहे हैं  पत्थर-पर्वत,  
ऊँघते स्वप्न की रात, 
सूनी सरित पर ठिठककर,  
सहमी हृदय की बात,  
अनमनी भोर में बैठी, 
पहने मौन का हार,  
ढलती साँझ मुस्कुरायी,  
थामे कुँजों की डार। 

मूक स्मृति हिय बैठी,  
वेदना अमिट छांव,  
समय सरिता संग ढूँडूं,  
अदृश्य कवित के पांव,  
काँपते किसलय खिल उठे,   
मिला बसंती दुलार,  
ढलती साँझ मुस्कुरायी, 
थामे कुँजों की डार। 

©अनीता सैनी