ठिठुरकर सुनाता करुण कथा,
झरोखों से झाँकती परछाइयाँ,
पलकों में भरती दीप-सी व्यथा।
अकाल के दौर में बनाया महल,
नींव में दबाए पेट की भूख
नींव में दबाए पेट की भूख
शौर्यगाथा अश्वमेध-यज्ञ की सुन,
आतुर राजा संग परिवेश हर्षाया।
वैराग्य में सिमटी सजी मनोदशा,
एकांत में सुनाती सरोवर संवाद
तलहटी से उठती करुण पुकार
अंतस से करती वाद-विवाद ।
तलहटी से उठती करुण पुकार
अंतस से करती वाद-विवाद ।
झील किनारे प्रतीक्षारत परछाई,
किरदार गढ़ने को व्याकुल हर पल,
सौंदर्यबोध दर्शाती ख़ामोश दीवारें,
राजसी भव्यता में डूबा जलमहल ।
©अनीता सैनी 'दीप्ति'

