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शनिवार, अप्रैल 25

झील किनारे



 निर्मल शीतल जल झील का,  
ठिठुरकर सुनाता करुण कथा, 
  झरोखों से झाँकती परछाइयाँ, 
पलकों में भरती दीप-सी व्यथा। 

अकाल के दौर में बनाया महल,  
नींव में दबाए पेट की भूख  
 शौर्यगाथा अश्वमेध-यज्ञ की सुन,   
आतुर राजा संग परिवेश हर्षाया। 

वैराग्य में सिमटी सजी मनोदशा,  
एकांत में सुनाती सरोवर संवाद 
तलहटी से उठती करुण पुकार 
अंतस से करती वाद-विवाद । 

झील किनारे प्रतीक्षारत परछाई, 
  किरदार गढ़ने को व्याकुल हर पल,  
सौंदर्यबोध दर्शाती ख़ामोश दीवारें, 
राजसी भव्यता में डूबा जलमहल । 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'