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सोमवार, सितंबर 30

जलमग्न हुए आशियाने



कहाँ से आये ये  काले बादल,  
किसने गुनाह की गुहार लगायी,  
जलमग्न हुए आशियाने, 
ज़िंदगियों ने चीख़-चीख़कर पुकार लगायी |

बरस रही क्यों घटा अधीर, 
विहग गान से क्यों मेघ ने काली बदरी बरसायी, 
चिर पथिक थे गाँव के वे  ग्वाले, 
क्यों उनको  भ्रम से भटकी राह दिखायी |

मूक-बधिर बने बेबस दर्द सारे, 
देख-सुन अरदास मन में झिरमिरायी, 
पथरा  गयी  पलकें ओ पालनहार !
क्यों प्रशासन ने सुध-बुद्ध गँवायी |

मनुहार माँगती गूँजती प्राण-वंशी, 
थक-हार दीप असुवन से जला, 
पल ने पलकों में उम्मीद थमायी, 
कहा विहंगम ने मधुर स्वप्न में यामिनी से, 
उफनती  सजल सरिता को सवेरे ने राह दिखायी |

© अनीता सैनी