कहाँ से आये ये काले बादल,
किसने गुनाह की गुहार लगायी,
जलमग्न हुए आशियाने,
ज़िंदगियों ने चीख़-चीख़कर पुकार लगायी |
बरस रही क्यों घटा अधीर,
विहग गान से क्यों मेघ ने काली बदरी बरसायी,
चिर पथिक थे गाँव के वे ग्वाले,
क्यों उनको भ्रम से भटकी राह दिखायी |
मूक-बधिर बने बेबस दर्द सारे,
देख-सुन अरदास मन में झिरमिरायी,
पथरा गयी पलकें ओ पालनहार !
क्यों प्रशासन ने सुध-बुद्ध गँवायी |
मनुहार माँगती गूँजती प्राण-वंशी,
थक-हार दीप असुवन से जला,
पल ने पलकों में उम्मीद थमायी,
कहा विहंगम ने मधुर स्वप्न में यामिनी से,
उफनती सजल सरिता को सवेरे ने राह दिखायी |
© अनीता सैनी

