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शुक्रवार, फ़रवरी 28

चीर तिमिर की छाती.... नवगीत



चीर तिमिर की छाती को अब,  
सूरज उगने वाला है, 
हार मान क्यों बैठा राही,
 तम के बाद उजाला है।

दूर नहीं है मंज़िल राही,
कुछ डग का खेल निराला है,
ढल जायेगी बोझिल रात्रि,
कर्म नश्वर नूतन उजाला है।

बंजर में कुसुम कुमोद खिला, 
धरा ने संबल संभाला है,  
चीर तिमिर की छाती को अब,  
सूरज उगने वाला है।

अंकुर प्रेम के हो पल्लवित, 
सृष्टि का करुण उजाला है, 
शरद चाँदनी हो आँगन में,
समय अनुराग निराला है।

नमी बंधुत्त्व की हो मन में,
हृदय स्वप्न  गूँथी  माला है, 
चीर तिमिर की छाती को अब,  
सूरज उगने वाला है।

©अनीता सैनी