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मंगलवार, मई 7

उम्र


चली  समय  के  साथ, 
आँकलन साँसों  का करती जाओ,  
सूखा   नीर  नयनों का,  
मेरी  प्रीत जताती  जाओ |

उम्र, समय की दासी, 
साँझ-सी ढलती जाये,  
हाल पूछ  बुढ़ापे से, 
कर  याद  जवानी  रोये |

समझ  सहलाये  मन,  
बिंब यादों का उभर आया, 
वक़्त के घनघोर भँवर में, 
उम्र का एक पड़ाव नज़र आया |

तन के मन में झाँकी उम्र, 
स्वयं  में  धँसती  जाये, 
अंबर की घनघोर घटाएँ,  
धरा की बाँहों में सिमटी जायें |

ढहतीं  मीनारें इच्छाओं की, 
छाया उम्र की मिटती जाये, 
समय पथ पर चलती, 
उम्र तन से विमुख हो जाये, 

झाँकी  उस   पथ  की  यादें, 
समय के  तूफ़ान  से  घबराती थी,  
खंडहर तन की  थी  साथी, 
 उम्र  उस  पर  मुस्काती थी |

ओढ़  समय की चादर,  
अंकुर नया  खिलाया था, 
सिमटा  समय के हाथों, 
उम्र का तावीज़ पहन धरा पर आया था |

-अनीता सैनी