गाँव / अनीता सैनी 'दीप्ति'
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मेरे अंदर का गाँव
शहर होना नहीं चाहता
नहीं चाहता सभ्य होना
घास-फूस की झोंपड़ी
मिट्टी पुती दीवार
जूते-चप्पल
झाड़ू छिपाने से परहेज करता
वह शहर होने से घबराता है
पूछता है- ”जीवन बसर करने हेतु
सभी को शहर होना होता है?”
आंतोनियो कहते हैं-
”मोहभंग न होते हुए
बिना भ्रम का जीवन जीना।”
जैसे मेड़ पर खड़े पेड़-पौधों के
शृंगार की धुलती मिट्टी
जीवंतता से भर देती है उन्हें
जीवन के कई-कई
अनछुए दिन-रात
दौड़ गए तिथियों की लँगोट पहने
शहर होने की होड़ में
अब पैरों से एक क्षण की बाड़
न लाँघी जाती
नुकीली डाब
पाँव में नहीं धँसती
हृदय को बिंधती है
न अंबर को छूना चाहता है
न पाताल में धँसना चाहता है
थोड़ी-सी जमी
मेरे अंदर का गाँव जीना चाहता है।
