दृश्य निर्मम यथार्थ का।
झुलसे पत्थर उजड़ी सड़क
दृश्य प्रज्वलित दोपहरी का।
देह मानव की भाप बनी
निशान नहीं पदचाप का।
खोजी श्वान का स्वाँग गढ़ा
भ्रमित परपीड़ा संताप की।
काल निर्वहन दिवाकर का
सृष्टि में व्याप्त व्यवधान का।
दिशाहीन बिखरे जन-जीवन
दृश्य शोकाकुल शोक दोपहरी का।
खींप-आक सब सूख रहे
दौर दयनीय दुनिया का।
लंबी-चौड़ी विचारपट्टिका
उकेरे चित्र कलिकाल का।
सूर्य निकला क्षितिज पर नहीं
सत्ता-शक्ति के बाज़ार का।
उड़नखटोला उतरा भारत में
नहीं समय शोहरत के बखान का।
©अनीता सैनी
©अनीता सैनी

