प्रयोगशाला की
परखनली में गर्माती राजनीति
अब गलियों के नुक्कड़ पर
घुलने लगी है साहेब!
दो वक़्त रोटी की फ़िक्र में
भटकती देह
हथियारों के ज़िक्र में
सूखने लगी है
इंसानियत नहीं साहेब!
कूटनीति फूट-फूटकर
करतब दिखाती
ताड़ के पेड़-सी सर उठने लगी है
बुद्धि को लगने लगा है
वो धरती घुमाने लगी है
तराजू में तुलती मानवता
ईमान-धर्म टूट-टूटकर बिखरने लगा है
माया का रचाया तूने कैसा खेल?
पाषाण उचक-उचककर खेलने लगें हैं
जगह बताते रिश्तों की
समझदार हो गए बच्चे साहेब!
अँगुली पकड़कर चलने वाले
बूढ़े माँ-बाप को अब
दुनियादारी समझाने लगे हैं।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'

