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शुक्रवार, सितंबर 20

ऐसा नहीं वक़्त सज्दे में झुका था




घटाओं के बदले तेवर,  
वे  तोहमत हवाओं पर लगाती थीं, 
दुहरा आसमां  झुका नहीं जज़्बातों से,   
वक़्त ने वक़्त से धोखा किया,वक़्त सज्दे में नहीं था |

गिरोह बना रहे  विश्व पटल पर, 
बादलों को बाँटने का वो दस्तूर  पुराना  था, 
संघर्ष के पड़ाव पर सूख जाती है विचारों की नमी, 
लम्हात को पता था वो भविष्य के दरिया में गहरा उतरा था |

आहट से बेख़बर वो बरबस मुस्कुराता बहुत था, 
कब किस राह से गुज़रेगा साँसों का कारवाँ,वो तारों से पूछता था,  
बेख़बर था वो देख जमघट काफ़िरों का, 
बुन रहा जाल ज़ालिमों के ज़लज़ले से,दोष उसी लम्हे का था |

हाहाकार हसरतों का सुना,बादलों के उसी दयार  में, 
 इंसानों के जंगल में भटके विचारों को हाँक रहा समय था, 
गूंगे-बहरों  की भगदड़ में फ़ाक़े बिताकर मर गया वह, 
ऐसा नहीं सज्दे में झुका था,जाने जलसा कब हुआ था ?

- अनीता सैनी