ऐन्द्रजालिक की भाँति छाया रहता है
घर के कोने-कोने में माया का ओढ़े गुमान।
माया महकती है सदृश्य हर पहर
हरशृंगार के पावन पुष्प के समान।
बाँधता नाज़ुक श्वेत धागा अंतस पर
व्यवहार का हल्की गठान के साथ।
मौन साधे आँखों से कुछ कहता
अहसास संग जोड़ता परिवार का हाथ।
नीरवता में भाव बिखेरता हँसता जैसे
लहरों को छिपाता आग़ोश में समंदर।
भावभीनी चुप्पी में सतरंगी स्वप्न बीनता
पैरों की जलन बिसराता तपती रेत पर।
कैसे गढ़ता है ज़िंदगी की हवा में जादू
निश्छल निरीह जीवन पर ऋतुएँ हर्षाईं।
यादों की एक गठरी उठाए कंधों पर
चल पड़ा जाने-पहचाने पथ पर हरजाई।
दृढ़ शक्ति अथाह विश्वास के बोता बीज
मन में नेह अँकुरित करता जैसे छलिया।
अनंत परिभाषाओं से गढ़ूँ नाम उसका
शीतल हवा-सा खिला देता मन कलियाँ।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'

